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संपादकीयः फिर आतंक

जम्मू-कश्मीर में सैनिकों और सैनिक-शिविरों पर लगातार हो रहे आतंकी हमले गहरी चिंता का विषय हैं।
Author April 29, 2017 03:02 am

जम्मू-कश्मीर में सैनिकों और सैनिक-शिविरों पर लगातार हो रहे आतंकी हमले गहरी चिंता का विषय हैं। गुरुवार को कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों ने एक सैन्य शिविर पर हमला किया, जिसमें एक कैप्टन समेत तीन जवान शहीद हो गए। छह घायल हैं। जवाबी कार्रवाई में सैनिकों ने भी दो पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिराया। यह हमला आठ महीने पहले उड़ी में हुए हमले की ही तर्ज पर हुआ, जिसमें सुबह साढ़े चार बजे सीमा पार से आए आतंकियों ने बीस जवानों को मार डाला था। पिछली बार की ही तरह इस बार भी आतंकी सीमा पार से दो स्तर की बाड़ सुरक्षा में सेंध लगा कर पहुंचे थे। दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा है कि स्थानीय लोगों ने मुठभेड़ के दौरान सेना को मौके पर जाने से रोकने की कोशिश की। यही नहीं, मुठभेड़ के दौरान मारे गए दो आतंकियों के शव मांगने के लिए स्थानीय लोग सैन्य शिविर के बाहर प्रदर्शन करने लगे। इस दौरान सैनिकों पर जमकर पथराव भी हुआ, जिसके जवाब में सैनिकों को गोली चलानी पड़ी, जिसमें एक उपद्रवी प्रदर्शनकारी की मौत हो गई और तीन घायल हो गए।

भारत-पाक सीमा पर इतनी कड़ी निगरानी और सख्त चौकसी के बावजूद आतंकियों का सीमा के भीतर घुस आना हैरानी की बात है। सीमा पर चौबीस घंटे हाई-एलर्ट रहता है। इसके बावजूद पाकिस्तान से आने वाले आतंकी भारतीय सैन्य शिविरों तक पहुंचने में कामयाब हो जाते हैं। इसका मतलब है कि सीमा की चौकसी की दोबारा समीक्षा करने और बेहतर रणनीति बनाने की जरूरत है। स्थानीय लोगों का आतंकियों की तरफदारी करना और हमदर्दी जताना भी चिंता पैदा करने वाली बात है। सरकार ने पत्थरबाजों को नियंत्रित करने के लिए बुधवार को घाटी में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन पंजगाम में स्थानीय भीड़ आतंकियों की मौत की खबर सुनते ही बेकाबू हो उठी और सैनिकों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। आतंकियों की तरफदारी करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

आतंकी तारबंदी पार कर सैन्य शिविर में घुसे थे। उनकी मंशा अंधाधुंध गोलियां बरसा कर अधिकाधिक कहर बरपाने की थी। उनके पास से काफी हथियार, गोला-बारूद और खाने-पीने का सामान भी बरामद हुआ है। हमले के तौर-तरीकों को पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जोड़ कर देखा जा रहा है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मत है कि इसे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने अंजाम दिया है। कुपवाड़ा से पहले उड़ी और पठानकोट हमले में भी जैश-ए-मोहम्मद का हाथ साबित हुआ था। कुल मिला कर जम्मू-कश्मीर में सेना पर हो रहे हमले हों या आंतरिक सुरक्षा में लगे सीआरपीएफ के जवानों पर, स्थिति विषम होती जा रही है। दो दिन पहले नक्सली हमले में छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ के पच्चीस जवान शहीद हो गए थे। अब समय आ गया है कि हम इसे छोटा-मोटा हमला न मानें और इससे निपटने के लिए व्यापक रणनीति तैयार की जाए। चाहे सीमा हो या आंतरिक मोर्चे पर डटा हुआ जवान, हर जान अमूल्य है। लंबे समय से सरकारें सिर्फ बातें करती रही हैं। जैसे भी हो, यह तबाही खत्म होनी चाहिए। कश्मीर घाटी में बहुत खून बह चुका है। केंद्र सरकार हो या जम्मू-कश्मीर सरकार, मिल-बैठ कर ठोस रणनीति तैयार करनी होगी।

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