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संपादकीयः मजदूर बच्चे

लोकसभा में मंजूरी के साथ ही अब बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2016 के कानून बनने का रास्ता साफ हो गया है।
Author July 28, 2016 03:10 am
Express File Pic

लोकसभा में मंजूरी के साथ ही अब बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2016 के कानून बनने का रास्ता साफ हो गया है। राज्यसभा में यह विधेयक पहले ही पारित हो चुका है। दुनिया भर में बच्चों को मजदूरी में झोंकने के खिलाफ लंबे समय से लड़ाई चल रही है और समय के साथ स्थिति में तेजी से सुधार भी आया है। भारत में भी बाल मजदूरी पर रोक लगाने के लिए सख्त कानूनी प्रावधान किए गए। मगर तमाम कानूनों के बावजूद आज भी बड़ी तादाद में बाल मजदूर अपने कई अधिकारों से वंचित हैं। फिर भी, पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान बाल मजदूरों की संख्या में अगर कुछ कमी आ सकी है तो इसकी वजह कानूनी सख्ती ही है।

सरकार की ओर से ताजा संशोधन विधेयक का मकसद भी बाल श्रम को पूरी तरह खत्म करना बताया गया है। इसमें चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के लिए परिवार से जुड़े व्यवसाय को छोड़ कर किसी भी क्षेत्र में काम करने पर पूरी तरह रोक की व्यवस्था है। पहली नजर में यह प्रावधान बच्चों के हक में लगता है, लेकिन एक मामूली-सी दिखने वाली कानूनी छूट के क्या नतीजे हो सकते हैं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। इस राहत के तहत चौदह साल तक के बच्चों को पढ़ाई के बाद परिवार के काम या पारिवारिक उद्यमों में काम करने की इजाजत होगी।

विधेयक में परिवार और पारिवारिक उद्यम की जो परिभाषा दी गई है, व्यवहार में उसका मतलब यह होगा कि एक बच्चे से उसके किसी रिश्तेदार के मालिकाने वाले व्यवसाय या निर्माण इकाई में काम कराया जा सकता है। यह पारंपरिक जाति-आधारित पेशों में बच्चों को उलझा देने का भी रास्ता बनेगा और सामाजिक न्याय की उम्मीदों को कमजोर करेगा। फिर चौदह से अठारह साल के बच्चों से काम कराने के मामले में जिस तरह जोखिम वाले उद्योगों की संख्या घटा कर तीन कर दी गई है, उससे असर का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह बेवजह नहीं है कि कई विपक्षी दलों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस विधेयक को पीछे ले जाने वाला कदम बताया है, जिसमें बहुत मुश्किल से हासिल किए गए बच्चों के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है। कुछ सांसदों ने यहां तक कहा कि संसद में बैठे हम लोगों में से कोई यह नहीं चाहेगा कि उनका बच्चा पढ़ाई के अलावा कहीं मजदूरी करे, भले वह किसी अपने संबंधी का व्यवसाय हो।

श्रममंत्री बंडारू दत्तात्रेय का मानना है कि कोई भी कानून जब जमीन से जुड़ा होता है, तभी टिकता है और लोगों को इंसाफ देता है। लेकिन यह एक जगजाहिर हकीकत है कि देश भर में बाल श्रम की चक्की में पिसते बच्चों की जमीनी समस्या क्या है। सही है कि गरीबी और अशिक्षा की मार झेलते परिवार अपने छोटे बच्चों को भी किसी काम में लगा देते हैं, पर क्या सिर्फ इस वजह से इन बच्चों को मजदूरी में लगा देने की कानूनी छूट दी जा सकती है? किसी भी पिछड़े और गरीब तबके या समाज की तस्वीर में बदलाव का रास्ता शिक्षा है। भारत में लंबे संघर्षों के बाद शिक्षा का अधिकार कानून की शक्ल ले सका है, पर जमीनी हकीकत बताती है कि बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) संशोधन विधेयक गरीब और पिछड़े वर्गों की भावी पीढ़ियों को शिक्षित करने की कोशिशों को धुंधला कर सकता है।

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