May 24, 2017

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संपादकीयः हेग का हासिल

अंतरराष्ट्रीय अदालत का अंतरिम फैसला बेशक भारत की कूटनीतिक जीत है, और पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका।

Author May 19, 2017 03:17 am
भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ने मार्च 2016 में पकड़ लिया था।

अंतरराष्ट्रीय अदालत का अंतरिम फैसला बेशक भारत की कूटनीतिक जीत है, और पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका। पर इसे यहीं तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इस फैसले से विएना समझौते की अहमियत और अंतरराष्ट्रीय अदालत की प्रासंगिकता भी एक बार फिर रेखांकित हुई है। नीदरलैंड की राजधानी हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कुलभूषण जाधव की फांसी पर अंतिम फैसला होने तक रोक लगा दी है। सुनवाई कर रहे पीठ के ग्यारह जजों ने यह आदेश सर्वसम्मति से सुनाया। गौरतलब है कि जाधव को पिछले महीने पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जासूसी और आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोप में फांसी की सुजा सुनाई थी। इस पर रोक लगाने की भारत की अपील को अंतरराष्ट्रीय अदालत ने त्वरित सुनवाई के योग्य पाया और बीते सोमवार को सुनवाई पूरी भी कर ली। सुनवाई के क्रम में ही यह लगने लगा था कि भारत का पलड़ा भारी है। पाकिस्तान की मुख्य दलील यह थी कि जाधव का मामला जासूसी से संबंधित होने और इस प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा का होने के कारण विएना समझौते के दायरे में नहीं आता। पर अदालत ने पाकिस्तान के इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।

विएना समझौता गिरफ्तार किए गए दूसरे देश के नागरिकों को, चाहे वे अपराध के शिकार हों या आरोपी हों, राजनयिक संपर्क तथा कानूनी मदद हासिल करने का भरोसा दिलाता है। यों यह समझौता कोई कानूनी बंधन नहीं है, पर इसे वैश्विक आम सहमति हासिल है। अगर कोई देश दूसरे देश के नागरिकों के मानवाधिकारों का खयाल नहीं रखेगा, तो वह बाकी दुनिया से अपने लिए वैसे ही व्यवहार की उम्मीद किस बिना पर करेगा! आखिर क्या कारण था कि मामले के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े होने की पाकिस्तान की दुहाई के बावजूद अदालत ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाया। दरअसल, जाधव के खिलाफ पाकिस्तान में चली न्यायिक कार्यवाही पूरी तरह संदिग्ध जान पड़ी। जाधव की गिरफ्तारी के बाद से राजनयिक संपर्क का भारत का अनुरोध तेरह बार नामंजूर कर दिया गया। आरोपी के लिए कानूनी मदद हासिल करने का रास्ता बंद था। आरोपपत्र की प्रति मुहैया नहीं कराई गई। साक्ष्य क्या हैं, नहीं बताया गया। जासूसी के आरोप के पक्ष में पाकिस्तान ने जाधव के पास मुसलिम नाम से एक अतिरिक्त पासपोर्ट मिलने का हवाला दिया था। पर अगर पाकिस्तान के पास अकाट्य प्रमाण थे, तो उसने जाधव को राजनयिक पहुंच और कानूनी मदद क्यों हासिल नहीं करने दी?

ऐसा लगता है कि जाधव के मामले के जरिए पाकिस्तान दुनिया भर का ध्यान इस तरफ खींचना चाहता रहा है कि भारत बलूचिस्तान में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। पर अंतरराष्ट्रीय अदालत के सामने उसकी गढ़ी गई कहानी की हवा निकल गई है। हालांकि फैसले को मानने के लिए पाकिस्तान कानूनन बाध्य नहीं है, पर मानने में ही उसकी भलाई है, क्योंकि न मानने से संयुक्त राष्ट्र के न्यायिक निकाय की अवमानना का लांछन उस पर लगेगा और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। फिर, पाकिस्तान किस मुंह से बाकी दुनिया में अपने नागरिकों के मानवाधिकारों का खयाल रखे जाने की अपेक्षा करेगा? इसका अहसास पाकिस्तान को पहले से है। शायद इसीलिए कानूनन बाध्य न होते हुए भी, हेग में उसने भारत की अपील पर सुनवाई का सामना करना स्वीकार किया। इस सुनवाई के दौरान हरीश साल्वे के नेतृत्व में भारत की कानूनी टीम ने जिस संजीदगी, समर्पण और योग्यता का परिचय दिया वह काबिले-तारीफ है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय अदालत का अंतिम फैसला भी अंतरिम फैसले जैसा ही आएगा। यों इस बीच दोनों देश समाधान की राजनीतिक या कूटनीतिक कोशिशें भी कर सकते हैं।

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First Published on May 19, 2017 3:17 am

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