December 08, 2016

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संपादकीयः जीएसटी की राह

वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को लागू करने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। जीएसटी परिषद की बैठक में सर्वसम्मति से करों का चार स्तरीय ढांचा तैयार कर लिया गया है।

Author November 5, 2016 02:12 am

पहले सभी वस्तुओं पर समान कर लगाने का प्रस्ताव था, जिसे लेकर कई राज्यों को एतराज था। अब सामान्य उपभोग की वस्तुओं पर सबसे कम यानी पांच फीसद कर लगेगा और सबसे अधिक यानी अट्ठाईस फीसद कर विलासिता की वस्तुओं और तंबाकू उत्पाद आदि पर लगेगा। इसके अलावा बीच के दो कर ढांचे बारह और अठारह फीसद हैं। इनके दायरे में ही ज्यादातर वस्तुएं और सेवाएं आएंगी। महंगाई पर काबू पाने के मकसद से सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं पर कर छह से घटा कर पांच फीसद रखना तय किया गया है। इस एक फीसद की भरपाई विलासिता की वस्तुओं पर कर और उपकर बढ़ा कर पूरा करने का निर्णय किया गया है। माना जा रहा है कि आम उपभोक्ता वस्तुओं पर कर कम होने से महंगाई का स्तर नीचे आएगा, मगर कहना मुश्किल है कि पहले के मुकाबले एक फीसद की कमी से इस दिशा में कितनी कामयाबी मिल पाएगी।


सरकार ने राज्यों को होने वाले राजस्व घाटे की भरपाई की तैयारी पहले ही कर रखी है। अतिरिक्त उपकर और स्वच्छ ऊर्जा उपकर से जमा धन के लिए एक अलग कोष बनाने का प्रस्ताव है, जिसका इस्तेमाल राज्यों को होने वाले राजस्व नुकसान की पूर्ति के लिए किया जाएगा। सरकार ने सितंबर में जीएसटी लागू करने संबंधी अधिसूचना जारी कर दी थी। नियम के मुताबिक अधिसूचना के बाद एक साल के भीतर जीएसटी लागू करना होता है। इसलिए इसके नए वित्त वर्ष में लागू होने की पूरी संभावना है। वैसे भी जीएसटी से जुड़े अधिकतर पहलुओं पर सरकार ने आपत्तियों को सुधार लिया है लिहाजा, इसे लागू करने में उसे परेशानी नहीं आनी चाहिए।
निस्संदेह केंद्रीय कर ढांचा लागू होने से कारोबारियों को राज्यों की तरफ से वसूले जाने वाले अलग-अलग परोक्ष और प्रत्यक्ष करों के भुगतान से मुक्ति मिलेगी और इस तरह उत्पादन में कुछ गति आएगी। उपभोक्ता को भी सहूलियत होगी। स्वाभाविक ही इससे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। हालांकि सकारात्मक नतीजों की तत्काल अपेक्षा करना जल्दबाजी होगी। जिन देशों में केंद्रीय कर ढांचा लागू किया गया, वहां लंबे समय बाद इसका सकारात्मक प्रभाव दिखना शुरू हुआ। इसलिए धैर्य के साथ-साथ इसे लागू करने के बाद तकनीकी पेचीदगियों पर भी सरकार को मुस्तैदी से ध्यान देना होगा। सबसे पहले घरेलू कारोबार पर ध्यान देना होगा, क्योंकि अक्सर घरेलू कारोबारी कर ढांचे में बदलाव के लिए दबाव बनाने की मंशा से बाजार में उतार-चढ़ाव का खेल रचते रहते हैं। जीएसटी के कर ढांचे में जल्दी-जल्दी बदलाव से न सिर्फ उपभोक्ता, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। न्यूजीलैंड और कनाडा जैसे देश इसके उदाहरण हैं कि वहां केंद्रीय कर ढांचे में लंबे समय तक कोई बदलाव नहीं किया गया और उसका लाभ काफी समय बाद मिलना शुरू हुआ। हमारे यहां जीएसटी लागू होने के बाद तीन साल तक नुकसान का अनुमान लगाया गया है, इस अवधि में राज्य सरकारों के राजस्व घाटे को पूरा करने का खाका तैयार किया गया है। अगर यह कुछ आगे भी खिंचे तो चिंता की बात नहीं। जिस तत्परता से सरकार ने इसे लागू करने का रास्ता साफ किया है, उसी तरह इसके लागू होने के बाद अनुपालन में भी मुस्तैदी दिखानी होगी।
हो सकते हैं।

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First Published on November 5, 2016 2:11 am

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