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संपादकीयः शह का हासिल

राजस्थान में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह के मारे जाने के बाद पैदा हुए हालात यह बताने के लिए काफी हैं कि अपराधियों को राजनीतिक शह देने या तात्कालिक फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने का हासिल क्या हो सकता है।
Author July 15, 2017 02:43 am
राजस्थान में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह

राजस्थान में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह के मारे जाने के बाद पैदा हुए हालात यह बताने के लिए काफी हैं कि अपराधियों को राजनीतिक शह देने या तात्कालिक फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने का हासिल क्या हो सकता है। इसके अलावा, जब अपराध की दुनिया में वर्चस्व कायम करने वाले किसी चेहरे में ही समाज का कोई हिस्सा अपना गौरव तलाशने लगे तो यह किस तरह के भविष्य का संकेत है! गौरतलब है कि बीस दिन पहले चुरु जिले के मालासर गांव में पुलिस ने मुठभेड़ में आनंदपाल सिंह को मार गिराया। उसके बाद से ही राजपूत समुदाय के लोग आनंदपाल की मौत को फर्जी मुठभेड़ का नतीजा बताते हुए सीबीआइ जांच की मांग कर रहे थे और शव का अंतिम संस्कार न होने देने पर अड़े हुए थे। लेकिन सरकार ने सीबीआइ जांच की मांग खारिज कर दी। कई बार नोटिस के बाद आखिरकार पुलिस ने गुरुवार को आनंदपाल के शव की अंत्येष्टि करा दी। दूसरी ओर, एक दिन पहले नागौर जिले के संवराद गांव में आनंदपाल के लिए आयोजित ‘श्रद्धांजलि सभा’ के बाद भड़की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई, वहीं इक्कीस पुलिसकर्मी और बत्तीस लोग घायल हो गए। इस घटना के विरोध में राजपूत संगठनों ने दस लाख राजपूतों की रैली निकालने की घोषणा की है।

जाहिर है, इस मसले पर जिस तरह की चुनौती खड़ी हो गई है उससे निपटना सरकार के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। जिस आनंदपाल सिंह के नाम पर आज राजस्थान एक खास तरह की उथल-पुथल से गुजर रहा है, उसे शह देने में राजनीतिकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। खुद वसुंधरा राजे सरकार के कई मंत्रियों तक पर उसे बढ़ावा देने के आरोप हैं। करीब ग्यारह साल पहले एक गैंगवार के जरिए अपना वर्चस्व कायम करने में चूंकि आनंदपाल सिंह अपने प्रतिद्वंद्वी गिरोहों पर भारी पड़ा था, इसलिए उसके समुदाय के कुछ लोगों ने उसे अपना ‘नायक’ मानना शुरू कर दिया। इस तरह का विवेकहीन समर्थन कब ‘आस्था’ में तब्दील हो जाता है, कहा नहीं नहीं जा सकता।

एक खबर के मुताबिक कुछ लोगों ने आनंदपाल के नाम पर मंदिर बनाने की मंशा जाहिर की है।
कई और राज्यों की तरह राजस्थान में भी राजनीति और सत्ता के ढांचे में जाति की पहचान की बड़ी भूमिका रही है। वोट के लिए संख्याबल चूंकि अहम है, इसलिए जिस राज्य में जिस जाति की बड़ी संख्या है, वहां उस जाति को कोई नाराज नहीं करना चाहता, बल्कि उनकी अनुचित मांगों के आगे भी राजनीतिक घुटने टेक देते हैं, चाहे वह आरक्षण का मामला हो या किसी अपराधी को बचाने का या उसे महिमामंडित करने का। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि कोई शख्स जितना बड़ा अपराधी होता है, कई बार वह अपनी जाति के लोगों के बीच उतना ही लोकप्रिय हो जाता है। आनंदपाल को भी इसी बुनियाद पर अपनी जाति का काफी समर्थन मिला और उससे बनने वाले वोट बैंक की ताकत ने उसे कुछ राजनीतिकों के बीच जगह दिलाई। लेकिन इस तरह का समर्थन और संरक्षण अंतत: समाज को भी खतरनाक मोड़ की तरफ ले जाता है और राजनीति को भी।

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