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संपादकीयः खुदकुशी की खेती

उच्चतम न्यायालय ने किसानों की आत्महत्या की घटनाओं के मद््देनजर उचित ही सरकार को तलब किया है।
Author March 29, 2017 03:58 am
प्रतीकात्मक चित्र

उच्चतम न्यायालय ने किसानों की आत्महत्या की घटनाओं के मद्देनजर उचित ही सरकार को तलब किया है। स्वयंसेवी संगठन ‘सिटीजन्स रिसोर्स ऐंड एक्शन ऐंड इनीशिएटिव’ की ओर से दायर की याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को न्यायालय ने कहा कि यह बेहद गंभीर मसला है। साथ ही, केंद्र को निर्देश दिया कि वह किसानों की आत्महत्याओं के मद््देनजर राज्यों द्वारा उठाए जाने वाले प्रस्तावित कदमों से एक माह के भीतर अवगत कराए। इस बारे में अदालत के संवेदनशील रुख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संबंधित याचिका गुजरात में किसानों पर मंडरा रहे संकट और उनकी आत्महत्याओं के संदर्भ में दायर की गई थी, पर अदालत ने याचिका का दायरा बढ़ा कर पूरे देश के किसानों की व्यथा को विचारणीय बना दिया। सवाल है कि इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने जैसा रुख दिखाया है, क्या सरकारें भी वैसी ही संवेदनशीलता का परिचय देंगी? अगर सरकारें सचमुच किसानों के प्रति संवेदनशील होतीं, तो किसानों की खुदकुशी का ऐसा सिलसिला क्यों रहता? शायद ही इतिहास के किसी अन्य दौर में किसी पेशे से जुड़े लोगों ने इतनी बड़ी तादाद में खुदकुशी की हो। उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से, यानी पिछले ढाई दशक में दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब, छत्तीसगढ़ के आंकड़े भी दूसरे राज्यों से बहुत ज्यादा हैं।

आखिर इतनी बड़ी त्रासदी के पीछे वजह क्या है? दरअसल, लंबे समय से खेती घाटे का धंधा बनी हुई है। मौसम की मार या किसी अन्य कारण से जब फसल चौपट होती है या पैदावार कम होती है तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, जब पैदावार खूब होती है तब भी अक्सर वाजिब दाम न मिल पाने के कारण वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। न सिर्फ राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा लगातार घटता गया है बल्कि तमाम अन्य पेशों के मुकाबले कृषि आय बहुत ही कम बढ़ी है। हमारी सरकारें और राजनीतिक पार्टियां इस मूलभूत समस्या से हमेशा आंख चुराती रही हैं। इसीलिए किसानों के हित में कभी कुछ होता भी है तो वह रियायत के कुछ फौरी कदमों या थोड़ी-मोड़ी राहत की कुछ योजनाओं तक सीमित रहता है। चाहे केंद्र हो या इस या उस दल की राज्य सरकारें, सबका रवैया कमोबेश एक जैसा ही रहता है। अगर फसल बीमा योजना और रियायती कृषि ऋण तथा कभी-कभार मिलने वाले कुछ मुआवजे आदि से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है। जब तक किसानों को उनकी उपज का न्यायसंगत मूल्य दिलाने और किसानों की न्यूनतम आय की गारंटी नहीं होगी, किसान संकट में फंसे रहेंगे और उनमें से कुछ हताशा में किसी भी हद तक जा सकते हैं।

भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने और किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने का वादा किया था। मगर केंद्र की सत्ता में आने के करीब तीन साल बाद भी उसने इस दिशा में कुछ नहीं किया है। यही नहीं, विभिन्न फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी पहले के मुकाबले बहुत कम बढ़ोतरी हुई है। अपनी उपज का न्यायसंगत मूल्य पाना तो दूर, कई बार किसानों के लिए अपनी बेची हुई फसल का भुगतान पाना भी बहुत दूभर हो जाता है। चीनी मिलों पर गन्ने का बकाया इसका सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है। कृषि और किसानों का संकट में होना हमारी अर्थव्यवस्था के एक बड़े क्षेत्र का संकट में होना तो है ही, हमारी खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी यह चिंताजनक स्थिति है। क्या यह उम्मीद की जाए कि इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने जो संज्ञान लिया है वह तर्कसंगत परिणति तक पहुंचेगा!

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