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संपादकीयः ब्रिक्स का हासिल

ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स के गोवा सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर आतंकवाद के मुद्दे पर एकजुटता दिखाने पर जोर दिया। यह सम्मेलन इसलिए भी उल्लेखनीय रहा कि इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंकवाद के मसले पर […]
Author October 17, 2016 01:53 am

ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स के गोवा सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर आतंकवाद के मुद्दे पर एकजुटता दिखाने पर जोर दिया। यह सम्मेलन इसलिए भी उल्लेखनीय रहा कि इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंकवाद के मसले पर दो पड़ोसी देशों का रुख अलग-अलग नहीं होना चाहिए। सम्मेलन में हिस्सा लेने आए रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन ने पाक अधिकृत कश्मीर में भारत की सर्जिकल स्ट्राइक को उचित ठहराया। पिछले महीने कश्मीर के उड़ी में सैन्य शिविर पर हुए आतंकी हमले के बाद भारत लगातार पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है। मगर चीन का रुख पाकिस्तान की तरफ मुलायम बना हुआ है। ऐसे में ब्रिक्स के मंच से चीन के सामने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर प्रधानमंत्री मोदी का कहना कि आतंकवाद दुनिया में शांति और तरक्की के रास्ते में बहुत बड़ा रोड़ा है, साफ-साफ चीन को इस मामले में अपना रुख बदलने पर विचार के लिए उकसाना था। हालांकि चीनी राष्ट्रपति ने आतंकवाद को लेकर भारत के रुख पर सहमति जताई, मगर उन्होंने पाकिस्तान के प्रति अपना रवैया बदलने का कोई संकेत नहीं दिया। जाहिर है, पाकिस्तान के साथ चीन के अपने राजनीतिक, सामरिक और व्यापारिक स्वार्थ जुड़े हैं और वह उस पर फिलहाल अपना रुख बदलने को तैयार नहीं है। उधर रूस के साथ भारत के ऊर्जा, प्रतिरक्षा और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में विकास को लेकर हुए समझौते न सिर्फ दोनों देशों के रिश्तों में मजबूती का संकेत हैं, बल्कि इससे चीन को स्पष्ट संकेत मिला है कि भारत पर उसके दबाव की कोशिश बहुत कारगर नहीं रहने वाली है।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान बंगाल की खाड़ी के आसपास के देशों- बांग्लादेश, भूटान, म्यामां, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड यानी बिम्सटेक के नेताओं ने भी ब्रिक्स नेताओं से मुलाकात की। इसमें स्पष्ट संकेत दिया गया कि ये देश मिल कर व्यापार, वाणिज्य, शांति और आतंकवाद से लड़ने की दिशा में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे। यह पाकिस्तान को अलग-थलग करने की दिशा में एक और बड़ा कदम साबित हो सकता है। सार्क सम्मेलन रद्द होने के बाद यह नया मोर्चा मजबूत होने से पाकिस्तान अपने पड़ोस में कमजोर होगा। पाकिस्तान को लेकर चीन के नरम रुख की वजहें साफ हैं। उसने पाकिस्तान में अपने परमाणु रिएक्टर लगा रखे हैं और वह दक्षिण एशिया में इसका बाजार बढ़ाना चाहता है। इसके अलावा पाकिस्तान में अपनी उपस्थिति बना कर वह भारत सीमा विवाद को भी उलझाए रखना चाहता है। अमेरिका से भारत की नजदीकी भी उसे रास नहीं आ रही। फिर आतंकवाद को लेकर उसका दृष्टिकोण भारत और अमेरिका से भिन्न है, इसलिए भी वह पाकिस्तान को दोषी मानने से बचता है। ऐसे में रूस के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत होने से भारत को अपनी ऊर्जा और प्रतिरक्षा संबंधी जरूरतों के लिए चीन की तरफ नहीं देखना पड़ेगा। मगर चीन के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और वह इससे अपने व्यापारिक रिश्ते कभी खत्म नहीं करना चाहेगा, इसलिए उसने व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत बनाने की बात कही है। फिलहाल भारत ने दुनिया भर में आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरने का अभियान चला रखा है, दुनिया के ज्यादातर देश उसके साथ हैं। ऐसे में चीन को बहुत देर तक पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद के प्रति अपनी आंखें मूंदे रखना शायद संभव न हो।

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First Published on October 17, 2016 1:53 am

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