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संपादकीयः आयोग का चुनाव

उच्चतम न्यायालय ने उचित ही सरकार से पूछा है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की बाबत कोई कानून क्यों नहीं है।
Author July 7, 2017 02:56 am

उच्चतम न्यायालय ने उचित ही सरकार से पूछा है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की बाबत कोई कानून क्यों नहीं है। साथ ही, एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह टिपणी भी है कि इस मामले को पूरी तरह सरकार के हाथ में छोड़ देना निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए ठीक नहीं है। यों यह सवाल पहली बार नहीं उठा है। अनेक विधिवेत्ता और राजनीतिक चिंतक इसे समय-समय पर उठाते रहे हैं। भाजपा के विपक्ष में रहते हुए पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलने की मांग उठाई थी। उन्होंने इस सिलसिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकार न करे बल्कि इसके लिए एक समिति हो और उसमें विपक्ष के नेता को भी शामिल किया जाए। लेकिन न तो इस बारे में कोई पहल हुई न वह मुद््दा ही कोई खास चर्चा का विषय बन पाया। दरअसल, जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह यही चाहती है कि जैसा चल रहा है चलता रहे, क्योंकि इस मामले में सरकार एकमात्र निर्णायक बनी हुई है।

जब मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल पूरा हो जाता है, तो शेष दो आयुक्तों में जो ज्यादा वरिष्ठ होता है उसे मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया जाता है। लेकिन केंद्र के अफसरों में से चुनाव आयुक्त लायक नाम मंत्रिमंडल से चर्चा करके प्रधानमंत्री तय करते हैं, और फिर प्रधानमंत्री के अनुरोध पर राष्ट्रपति उनकी नियुक्ति करते हैं। इस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन भी सरकार के ही हाथ में रहता है। लेकिन यह प्रक्रिया पूरी तरह एकपक्षीय है और चुनाव आयोग जैसी संस्था के लिए, जिससे हर हाल में निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, ठीक नहीं है। जैसा कि सर्वोच्च अदालत ने भी कहा, इसका यह अर्थ नहीं कि आयोग की निष्पक्षता पर उंगली उठाई जा रही है। अदालत ने अब तक के सभी मुख्य चुनाव आयुक्तों के काम को प्रशंसनीय बताया है। लेकिन एक ऐसी संस्था, जिस पर पूरे देश में चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी है, और जो निष्पक्षता की बुनियाद पर गठित हुई है, उसके सर्वोच्च अधिकारियों को सरकार चुने, यह एकदम बेतुका है। केंद्रीय सूचना आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए बाकायदा एक समिति होती है जिसके सदस्यों में लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी शामिल किया जाता है। लोकपाल की नियुक्ति अभी नहीं हुई है, पर उसके चयन के लिए विपक्ष के नेता की भी सहमति अनिवार्य है।

सीबीआइ तो सूचना आयोग या संभावित लोकपाल की तरह स्वतंत्र संस्था भी नहीं है, बल्कि व्यवहार में यही देखने में आता है कि वह सरकार के सीधे नियंत्रण में काम करती है, फिर भी सीबीआइ के निदेशक की नियुक्ति में विपक्ष के नेता की राय ली जाती है। सर्वोच्च अदालत ने इस पर हैरानी जताई है कि निर्वाचन आयुक्तों का चयन पूरी तरह सरकार के विवेकाधिकार में है! साथ ही सरकार से पूछा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में कोई कानून क्यों नहीं है? इस पर महाधिवक्ता ने पहले तो अदालत को यह समझाना चाहा कि याचिका सुनवाई-योग्य नहीं है, पर अदालत ने वे दलीलें खारिज कर दीं, तब महाधिवक्ता ने यह टालू जवाब दिया कि कानून बनाना संसद का काम है। सवाल है कि सरकार इस बारे में पहल क्यों नहीं करती? अदालत ने याद दिलाया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्र नियुक्ति के लिए कानून बनाने की बात कही गई थी। वह तकाजा कब पूरा होगा?

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First Published on July 7, 2017 2:56 am

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