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संपादकीयः इधर उधर

उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्ष के साथ रहने का संकेत दिया है।
Author July 8, 2017 02:28 am
बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार

उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्ष के साथ रहने का संकेत दिया है। उनका यह रुख राष्ट्रपति चुनाव की बाबत उनके फैसले से उलट है। राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्होंने राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा कर रखी है। ऐसे में सहज ही यह सवाल उठता है कि आखिर नीतीश कुमार किस सैद्धांतिक धरातल पर खड़े हैं? कोविंद की उम्मीदवारी घोषित होते ही उन्होंने ‘निजी प्रसन्नता’ व्यक्त की थी। तब लगा कि कोविंद के बिहार का राज्यपाल रहने के दौरान दोनों के बीच सौहार्द रहा होगा और शायद उसी के नाते वे व्यक्तिगत तौर पर खुशी का इजहार कर रहे हैं। या, हो सकता है उन्होंने राज्यपाल के तौर पर कोविंद का नाता बिहार से होने की याद दिलाना चाहा हो। या, क्या पता कोविंद के बहाने नीतीश दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाना चाहते रहे हों। लेकिन कोविंद के प्रति समर्थन घोषित करने से पहले, नीतीश कुमार ने विपक्ष के उम्मीदवार का नाम सामने आने का इंतजार क्यों नहीं किया?

कांग्रेस की पहल पर सत्रह विपक्षी दलों ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया, तो लगा कि नीतीश अब शायद पुनर्विचार कर सकते हैं, क्योंकि कोविंद की तरह मीरा कुमार भी दलित हैं। फिर, मीरा कुमार का बिहार से कहीं ज्यादा गहरा नाता है, वे बिहार से पांच बार सांसद रह चुकी हैं। यूपीए सरकार के समय वे लोकसभा अध्यक्ष थीं। इस तरह, उनका राजनीतिक और विधायी अनुभव भी कहीं अधिक है। लेकिन नीतीश नहीं पसीजे। क्या इसलिए कि वे कोविंद को बेहतर उम्मीदवार मानते होंगे? फिर, उपराष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने विपक्ष के साथ रहने का भरोसा क्यों दिलाया है, जबकि किसी तरफ से कोई उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ है? नोटबंदी के मुद््दे पर भी उनका रुख बाकी विपक्ष से अलग था। पर नीतीश यह भी जानते हैं कि राजनीतिक निर्णय लेने में वे पूरी तरह अपनी मर्जी के मालिक नहीं हैं।

वे एक साझा सरकार के मुखिया हैं जिसमें राजद और कांग्रेस भी शामिल हैं। अगर नीतीश इस गठबंधन से अलग हो जाएं तो राजद और कांग्रेस को बहुमत का आंकड़ा छूने के लिए केवल पंद्रह विधायकों की जरूरत पड़ेगी। अगर फौरी नफा-नुकसान का मोह छोड़ कर नीतीश भाजपा का दामन थाम लें, तो उनकी विश्वसनीयता पर आंच आएगी। क्योंकि जद (एकी) ने राजग से अलग होने और मोदी-विरोध का रास्ता चुना तो इसमें नीतीश की ही निर्णायक भूमिका थी। तब उन्होंने इसे नीतिगत और वैचारिक रंग दिया था; अब किस मुंह से वे भाजपा का हाथ थामेंगे?
अकेले चलना उनके लिए बहुत जोखिम भरा होगा, क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को शानदार जीत भले मिली, वोट भाजपा का सबसे ज्यादा था, 24.4 फीसद। इसलिए अकेले चलने का खतरा नीतीश शायद ही मोल लें। पर दूसरी तरफ उनकी परेशानी यह है कि राजद के साथ मिलकर सरकार चलाने से उनकी छवि पर आंच आ रही है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू प्रसाद यादव का पूरा परिवार ही चपेटे में आ गया है। यों नीतीश कह चुके हैं, कानून अपना काम करे, वे अपना काम कर रहे हैं। पर जिस सरकार के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री बेनामी संपत्ति जमा करने के मामले में आय कर विभाग की जांच का सामना कर रहे हों, उस सरकार के मुखिया की सांसत का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या इन छापों और जांच का एक मकसद लालू और नीतीश के बीच दरार डालना और विपक्ष की कोई बड़ी एकता न बनने देना भी है? जो हो, अगर नीतीश ढुलमुल दिखेंगे और कभी इधर कभी उधर चलेंगे, तो इससे उनकी साख में इजाफा नहीं होगा, बल्कि उनके कार्यकर्ता व समर्थक भ्रम के शिकार होते रहेंगे।

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