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संपादकीयः भ्रष्टाचार के स्रोत

नोएडा प्राधिकरण के निलंबित मुख्य इंजीनियर यादव सिंह की गिरफ्तारी ने एक बार फिर अफसरशाही, राजनीति और कारोबार के भ्रष्ट तत्त्वों के गठजोड़ की तरफ इशारा किया है।
Author February 5, 2016 02:45 am
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नोएडा प्राधिकरण के निलंबित मुख्य इंजीनियर यादव सिंह की गिरफ्तारी ने एक बार फिर अफसरशाही, राजनीति और कारोबार के भ्रष्ट तत्त्वों के गठजोड़ की तरफ इशारा किया है। गौरतलब है कि प्राधिकरण में यादव सिंह के रहते हुए दिसंबर 2011 में सिर्फ कार्य-दिवसों में लगभग 954 करोड़ रुपए के निर्माण-कार्यों के बांड जारी किए गए थे। जबकि पूरे एक वित्तीय वर्ष में अमूमन दो हजार करोÞड़ रुपए के निर्माण-कार्यों की मंजूरी दी जाती है। पहली ही नजर में दाल में कुछ काला होने का शक होता था, जो सीबीआई की जांच के बाद अब गहरा गया है। सीबीआई तीन हजार से ज्यादा फाइलें खंगाल चुकी है और उसकी जांच-पड़ताल बताती है कि ठेके देने में नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए थे और भारी अनियमितता बरती गई।

क्या राजनीतिक सरपरस्ती के बगैर यह सब हुआ होगा? यादव सिंह बसपा सरकार के खासमखास थे, मगर सपा सरकार बनने पर वे जल्दी ही उसके भी चहेते बन गए। सपा सरकार ने न केवल उनका निलंबन समाप्त कर दिया, बल्कि क्लीन चिट देते हुए उन्हें तीन महत्त्वपूर्ण प्राधिकरणों का मुख्य इंजीनियर भी बना दिया। उनके खिलाफ सीबीसीआईडी जांच उन्हें बेकसूर बता कर बंद कर दी गई। मगर इससे उन्हें बचाया नहीं जा सका। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले साल जुलाई में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यादव सिंह और उनके करीबियों के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश दिए।

यों राज्य सरकार ने भी एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया था, उसका कार्यकाल बढ़ाया गया, पर उसकी रिपोर्ट अब भी नहीं आई है। ठेके देने में भारी कमीशनखोरी और आय से अधिक संपत्ति के मामले में यादव सिंह की गिरफ्तारी के बाद अटकलें लगाई जा रही हैं कि सीबीआई का अगला निशाना कौन होगा। पर नामों को लेकर कयासबाजी के बजाय सोचने का असल मसला यह है कि भ्रष्टाचार हो सकने की इतनी ज्यादा गुंजाइश क्यों है? इसे रोकने के पर्याप्त संस्थागत प्रबंध क्यों नहीं हो सकते?

दरअसल, ठेकों से लेकर नौकरियों तक तमाम लाभ वाली चीजें हासिल करना नौकरशाहों तथा सत्तारूढ़ राजनीतिकों की मर्जी पर निर्भर करता है। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें, सिपाही से लेकर शिक्षकों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तक की भर्ती में घूस मांगे जाने के किस्से आम हैं। पसंद की तैनाती और तबादला भी भ्रष्टाचार का एक पुराना जरिया रहा है। इसी तरह ठेकों का आबंटन भी। इनकी प्रक्रियाएं पारदर्शी तथा सत्ता के गलियारे से स्वायत्त बना दी जाएं, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश के कुछ ठोस उपाय जरूर किए जा सकते हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पिछले दिनों आई रिपोर्ट बताती है कि भारत भ्रष्टाचार के वैश्विक सूचकांक में अब भी वहीं है जहां वह एक साल पहले था।

हालात का एक बयान मुंबई उच्च न्यायालय के नागपुर पीठ के एक जज की उस टिप्पणी में भी देखा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार इसी तरह चलता रहा तो लोगों को टैक्स देना बंद कर देना चाहिए। बेशक यह टिप्पणी फैसले का अंश नहीं है, और इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक न्यायाधीश के क्षोभ के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन निर्णायक जगहों पर क्या हो रहा है? लोकपाल कानून बने डेढ़ साल से ज्यादा वक्त हो चुका, पर लोकपाल संस्था का गठन नहीं हो पाया है। लोकायुक्तों के पास पर्याप्त संसाधन और अधिकार नहीं हैं। क्या कारण है कि कुछ-कुछ अंतराल पर भ्रष्टाचार की व्यापकता की तरफ ध्यान दिलाने वाले भंडाफोड़ होते रहते हैं, पर भ्रष्टाचार से निपटने की संस्थागत खामियां भी बनी रहती हैं!

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