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फैसले का संदेश

आखिरकार मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने जुलाई 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों के दोषियों को सजा सुना दी।
Author October 3, 2015 17:06 pm

आखिरकार मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने जुलाई 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों के दोषियों को सजा सुना दी। यह फैसला दहशतगर्दी के खिलाफ एक सख्त चेतावनी है। संयोग से आतंकवाद से जुड़े एक अन्य मामले में भी इसी दिन फैसला आया। सर्वोच्च न्यायालय ने बीस साल पहले जम्मू-कश्मीर में हुए विस्फोट के लिए हिजबुल मुजाहिदीन के एक आतंकी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। गौरतलब है कि 1995 में जम्मू के मौलाना आजाद मेमोरियल स्टेडियम में गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान किए गए विस्फोट से आठ लोगों की मौत हो गई थी और अठारह घायल हो गए थे। जहां तक मुंबई की ट्रेनों में हुए धमाकों की बात है, यह भारत में उस समय तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था, जिसमें एक सौ अट्ठासी लोगों की मौत हुई और आठ सौ से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे।

इसके बाद भी सबसे भयावह आतंकी हमला मुंबई में ही हुआ। छब्बीस नवंबर 2008 को हुए इस हमले में पाकिस्तान की भूमिका प्रत्यक्ष दिखती थी; हमलावर समुद्र के रास्ते कराची से आए थे। एक आतंकवादी के जिंदा पकड़ लिए जाने और उससे हुई पूछताछ से भी हमलावरों को पाकिस्तान में प्रशिक्षण और वित्तीय मदद मिलने की सच्चाई और पुष्ट हुई थी। पर मुंबई की ट्रेनों में हुए धमाकों के तारभी पाकिस्तान से जुड़े हुए थे। विशेष टाडा अदालत ने मामले के बारह दोषियों में से पांच को फांसी और बाकी सात को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इनमें से ज्यादातर की कहानी यही है कि उन्हें धमाकों के लिए पाकिस्तान में हथियार चलाने और साजिश को अंजाम देने का तकनीकी प्रशिक्षण मिला। इनके अलावा तेरह फरार आरोपी तो पाकिस्तान के ही हैं, जिनकी इन धमाकों में अहम भूमिका थी।

जिन दोषियों को सजा सुनाई गई है उन्हें महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते ने घटना के बाद तीन महीने के भीतर गिरफ्तार कर लिया था। उनसे हुई पूछताछ और जांच से पता चला कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ के साथ मिल कर साजिश को अंजाम दिया। पर यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रेन धमाकों के सभी दोषियों का संबंध सिमी यानी स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया से पाया गया। जब संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर सिमी पर प्रतिबंध लगा, तो कई राजनीतिकों ने उसका बचाव करने की कोशिश की थी, यह कहते हुए कि उसे नाहक परेशान किया जा रहा है। ताजा फैसले के जरिए सिमी की हकीकत एक बार फिर सामने आ गई है।

अभियोजन पक्ष ने आठ दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग थी। अदालत ने पांच को ही फांसी की सजा सुनाई है। पर कुल मिला कर पीड़ित पक्ष ने संतोष जताया है। आरोपियों ने फिर दोहराया है कि असली दोषी वे नहीं हैं। उनके इस दावे का फैसला ऊपरी अदालत करेगी। असल सवाल यह है कि मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों से क्या सबक लिए गए थे, यानी उसके बाद आतंकवाद से निपटने की हमारी तैयारियों में क्या सुधार आया था? यह सवाल इसलिए उठता है कि मुंबई में ही करीब दो साल बाद फिर इतना बड़ा आतंकवादी हमला हुआ कि पूरा देश स्तब्ध रह गया। लिहाजा, अदालत का फैसला जहां आतंकवाद के खिलाफ एक संदेश है, वहीं परोक्ष रूप से हमारी आंतरिक सुरक्षा के सामने एक सवाल भी।

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