ताज़ा खबर
 

बिहार विधानसभा चुनाव 2015: अपनी ढपली

समाजवादी पार्टी की बिहार में कोई खास पैठ कभी नहीं रही। फिर भी सपा के ताजा फैसले से राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एकी) और कांग्रेस के गठबंधन को झटका लगा है, तो इसकी वजहें जाहिर हैं। माना जा रहा था कि इस बार बिहार विधानसभा का चुनाव जनता परिवार यानी कभी जनता दल में […]
Author नई दिल्ली | September 4, 2015 08:23 am

समाजवादी पार्टी की बिहार में कोई खास पैठ कभी नहीं रही। फिर भी सपा के ताजा फैसले से राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एकी) और कांग्रेस के गठबंधन को झटका लगा है, तो इसकी वजहें जाहिर हैं। माना जा रहा था कि इस बार बिहार विधानसभा का चुनाव जनता परिवार यानी कभी जनता दल में रहे मगर बाद में अलग-अलग पार्टियों में बिखर गए नेताओं की एकजुटता का भी इम्तहान होगा।

अगर साथ चुनाव लड़ने की उनकी कवायद कामयाब रही, तो वे विलय कर नया दल बनाने की ओर भी बढ़ सकते हैं। ‘महागठबंधन’ से अलग होने के सपा के निर्णय से दो बातें जाहिर हैं। एक यह कि बिहार के इस चुनाव में कोई जनता परिवार नहीं होगा। दूसरे, इन सबकी एकता से नया दल बन पाने की संभावना भी एकदम धूमिल हो गई है। अलबत्ता फिलहाल कहना मुश्किल है कि बिहार के चुनावी नतीजों पर इसका क्या असर पड़ेगा। समाजवादी पार्टी का बिहार में कोई विशेष आधार नहीं रहा है। यही वजह होगी कि महागठबंधन में सीटों के बंटवारे में उसे तवज्जो नहीं मिली।

शुरू में तीन सीटों की पेशकश की गई, बाद में पांच सीटों की। ये शायद वे सीटें थीं जो पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को दी जानी थीं। पर सपा को पांच सीटों के प्रस्ताव से संतोष नहीं हुआ। और अब उसने अलग से चुनाव लड़ने का इरादा जताया है। जहां दो ताकतवर गठबंधन आमने-सामने होंगे, वहां सपा अकेले क्या कर पाएगी? उसे खुद कुछ हासिल हो या न हो, लालू-नीतीश के गठबंधन को वह कुछ नुकसान जरूर पहुंचा सकती है। टिकट न मिलने पर जद (एकी) और राजद के नाराज लोग समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। और यही लालू-नीतीश के लिए सबसे चिंता की बात होगी।

बिहार में राजद और जद (एकी) के बीच सीटों का बंटवारा सबसे मुश्किल था, क्योंकि दोनों पार्टियां लंबे समय से एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी थीं। यह दिलचस्प है कि इन दोनों के बीच तो सीटों का हिसाब बैठ गया, पर सपा के साथ पटरी नहीं बैठी, जो वहां हाशिये की खिलाड़ी है। यह भी कम रोचक नहीं है कि नाता तोड़ने वाले मुलायम सिंह एक समय जनता परिवार की एकता के प्रयासों के केंद्र में थे।

विलय कर नई पार्टी के गठन की जो योजना बनी थी, उसके अध्यक्ष के तौर पर मुलायम सिंह का ही नाम सोचा गया था। पर यह भी सच है कि एकता की इन कोशिशों और नई पार्टी बनाने की योजना में सबसे कम दिलचस्पी समाजवादी पार्टी की थी। बल्कि सपा के कई नेता इसके खिलाफ थे। दरअसल, सपा के अनेक नेताओं को यह लगता रहा है कि जनता परिवार एक हुआ, तो उनकी पूछ कम हो जाएगी।

जबकि एक होने पर भी उत्तर प्रदेश में उनके जनाधार में कोई इजाफा नहीं होगा, क्योंकि लालू और नीतीश का प्रभाव बिहार तक सीमित है। लेकिन अगर बिहार में लालू और नीतीश को नुकसान पहुंचेगा, तो इसका साफ मतलब है कि इससे भाजपा ही और मजबूत होगी और इसका खमियाजा देर-सबेर समाजवादी पार्टी को भी भुगतना होगा। जनता परिवार की एकता की पहल ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की मजबूती और विपक्ष में कांग्रेस से इतर एक धुरी बनने के भी आसार पैदा किए थे। अब उस पर भी पानी फिर गया है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग