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मोसुल की मुक्ति

तीन साल से चल रही इस लड़ाई में दस लाख लोग घरबार छोड़ भाग गए और हजारों लोग मारे गए। मोसुल की इमारतें, बाजार, रिहाइशी बस्तियों का करीब अस्सी फीसद हिस्सा तबाह हो चुका है।
Author July 11, 2017 04:14 am
प्रतीकात्मक चित्र

इराक के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसुल को नौ महीने की कड़ी लड़ाई के बाद इराकी सेना ने आइएस (इस्लामिक स्टेट) के कब्जे से मुक्त करा लिया है। 2014 में ‘स्वघोषित खलीफा’ अल बगदादी की अगुआई में आइएस ने इराकी सेना को पछाड़ कर इस पर कब्जा कर लिया था। कच्चे तेल से संपन्न इस शहर को बगदादी ने अपनी राजधानी बनाया था, जहां से उसने इराक के कई दूसरे शहरों और ग्रामीणों इलाकों में अपनी समांतर सत्ता कायम कर ली थी। तीन साल से चल रही इस लड़ाई में दस लाख लोग घरबार छोड़ भाग गए और हजारों लोग मारे गए। मोसुल की इमारतें, बाजार, रिहाइशी बस्तियों का करीब अस्सी फीसद हिस्सा तबाह हो चुका है। यह खूबसूरत शहर अब वीरान और बदहाल है। जाहिर है, मोसुल की मुक्ति के बाद अब वहां सबसे बड़ी चुनौती नागरिक सेवाएं बहाल करने तथा पुनर्निर्माण की है।

नौ महीने पहले शुरू हुए घमासान में दोनों तरफ से बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं, लेकिन अभी तक कोई अधिकृत आंकड़ा जारी नहीं हुआ है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इस शहर को दोबारा आबाद करने के लिए एक अरब डॉलर से ज्यादा खर्च आएगा। गौरतलब है कि इस जंग में अमेरिका के ‘एलाइट काउंटर टेररिज्म सर्विस’ के सैनिकों ने आइएस को मार भगाने में हवाई हमले करके और जमीन पर भी इराकी सेना का साथ दिया। आइएस का उदय 2014 में हुआ, जब मध्य एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के कई मुसलिम देशों में बगावत हुई और लंबे अरसे से शासन जमाए बैठे सत्ताधीशों को विद्रोहियों ने गद््दी से हटा दिया। उस समय लगा कि यह सब किसी क्रांतिकारी बदलाव के लिए हो रहा है, लेकिन इसकी असलियत जल्द ही सामने आ गई। इस संगठन ने 29 जून 2015 को अबू बकर अल बगदादी को अपना ‘खलीफा’ बना दिया और दुनिया के मुसलिम-बहुल देशों को अपने कब्जे में लेने की घोषणा कर दी। इराक और सीरिया में सक्रिय इस संगठन में सुन्नी मुसलमानों का वर्चस्व है और अनुमान है कि इसका बजट दो अरब डॉलर का है। आत्मघाती हमले समेत हर तरह की आतंकी वारदात को अंजाम देने और अपहरण कर फिरौती वसूलने में आइएस के लोग माहिर हैं।

इराक और सीरिया के तेल के दस बड़े कुओं पर आइएस ने शुरू में कब्जा कर लिया था, लेकिन यह सब उसके हाथ से धीरे-धीरे निकल रहा है। रूस की मदद से सीरिया सरकार ने आइएस को काफी नुकसान पहुंचाया है, हालांकि लड़ाई का अंत अभी नहीं हुआ है। एक मोटा अनुमान है कि आइएस के पास दस हजार लडाÞके हैं। आइएस की ताकत के पीछे अरब जगत के कुछ देशों की परोक्ष सहायता भी थी। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मोसुल से कब्जा हटने के बाद इसकी कमर काफी हद तक टूट गई है। आइएस के कब्जे वाले तीन बड़े शहर तिकरित, रामादी और फजुल्लाह पहले ही मुक्त कराए जा चुके हैं। फिर भी इसे आइएस का खात्मा नहीं मान सकते। इस पराजय से उसे करारी चोट जरूर पहुंची है, पर ग्रामीण इराक के कुछ हिस्सों पर उसका कब्जा अब भी कायम है। फिर, कुछ बरसों से वह दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठन रहा है। लिहाजा, सतर्कता में कमी नहीं आनी चाहिए।

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