December 08, 2016

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सके बाद विपक्षी दलों की ओर से आने वाले आरोपों की तीव्रता कमजोर होगी।

Author December 1, 2016 06:33 am
भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (Photo: PTI)

पिछले महीने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक पांच सौ और एक हजार के नोटों की चलन बंद करने की घोषणा की तभी से विपक्षी दलों की ओर से ऐसे आरोप सामने आ रहे थे कि इस फैसले की जानकारी चुनिंदा भाजपा नेताओं और उनके करीबी लोगों को दी गई; फिर इन लोगों ने अपने नोट बैंक में जमा करा दिए। निश्चित तौर पर ये गंभीर आरोप थे, जिसे लेकर काफी भ्रम फैला हुआ था कि अगर मोदी देश भर में मौजूद काले धन को लेकर इतने सख्त हैं तो यही रुख अपनी पार्टी के लोगों के लिए क्यों नहीं अख्तियार करते! शायद यही वजह है कि भाजपा के संसदीय दल की बैठक में नरेंद्र मोदी ने पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों से कहा कि वे आठ नवंबर से इकतीस दिसंबर के बीच अपने बैंक खातों के लेनदेन का ब्योरा अगले साल एक जनवरी तक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को सौंप दें।

जाहिर है, इसके बाद विपक्षी दलों की ओर से आने वाले आरोपों की तीव्रता कमजोर होगी। खासकर इसलिए भी कि नोटबंदी की घोषणा के बाद ऐसी शिकायतें भी आर्इं थी कि लोगों ने बड़ी तादाद में पांच सौ और हजार के नोट अपने बैंक खाते में जमा किए और इस तरह से जो पैसा पहले भ्रष्ट तरीके से जमा किया गया था, उसे सफेद बनाने की कोशिश की गई। इसमें भाजपा के अनेक नेताओं पर आरोप थे। लेकिन यह सवाल तब भी रह जाता है कि आरोप अगर नोटबंदी की घोषणा के ठीक पहले नोटों की अदला-बदली या खातों में जमा करने के थे, तो हिसाब आठ नवंबर के बाद का ही क्यों हो! अगर नोटबंदी की सूचना कुछ नजदीकी लोगों को पहले देने की बात कही गई, तो जाहिर है कि उन्होंने पुराने नोटों को ठिकाने लगाने का काम पहले ही किया होगा। शायद इसीलिए कुछ पार्टियां भाजपा नेताओं के पिछले एक साल के खातों का हिसाब सामने रखने पर जोर दे रही हैं। फिर जब देश भर में लोगों के बैंक खातों का हिसाब-किताब संबंधित सरकारी महकमे ले रहे हैं तो आखिर किन वजहों से भाजपा नेताओं के बैंक खातों का ब्योरा अमित शाह को सौंपने का आदेश जारी किया गया है?

यह किसी से छिपा नहीं है कि नोटबंदी से पैदा हालात और अफरा-तफरी में एक बड़ी आबादी परेशान है, अपने ही पैसे के लिए उसे भटकना पड़ रहा है। करीब तीन हफ्ते गुजर जाने के बाद भी हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। बिना किसी ठोस तैयारी के की गई इस कवायद का सीधा असर बाजार में नकदी खरीदारी पर पड़ा है और इससे अर्थव्यवस्था को बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में राजनीतिकों का अपने प्रभाव का उपयोग करके बैंकों के जरिए अपने पास मौजूद रकम को सफेद बनाने की कोशिश करने की शिकायतें आती हैं तो यह बेहद अफसोसनाक है। इसलिए अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि उनकी ताजा पहल पर कोई सवालिया निशान न उठे तो ताजा कदम को ठोस शक्ल देकर उन्हें अपनी पार्टी के नेताओं को भी कठघरे में खड़ा करना चाहिए और उसका ब्योरा संबंधित सरकारी महकमों में जमा कराने का आदेश देना चाहिए। अगर अपने सांसदों-विधायकों के हिसाब-किताब की जांच महज दिखावा साबित हुई तो इसे भी आखिरकार मूल समस्याओं की ओर से ध्यान बंटाने की कोशिश के तौर पर ही देखा जाएगा।

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First Published on December 1, 2016 1:32 am

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