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संपादकीयः मणिपुर की कमान

पिछले दिनों आए चुनाव नतीजों को कुल मिलाकर स्वाभाविक ही भारतीय जनता पार्टी की शानदार उपलब्धि और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे के तौर पर देखा जा रहा है, पर इनमें मणिपुर का परिणाम एक मायने में सबसे खास है।
Author March 17, 2017 03:22 am
Manohar Parrikar, Goa CM oath: मनोहर पर्रिकर गोवा के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं।

पिछले दिनों आए चुनाव नतीजों को कुल मिलाकर स्वाभाविक ही भारतीय जनता पार्टी की शानदार उपलब्धि और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे के तौर पर देखा जा रहा है, पर इनमें मणिपुर का परिणाम एक मायने में सबसे खास है। दशकों से यह राज्य कांग्रेस शासित रहा है, यहां पहली बार भाजपा की सरकार बनी है। यों लगभग पूरा पूर्वोत्तर ही भाजपा के प्रभाव से अछूता था। पूर्वोत्तर में पहली सफलता भाजपा को पिछले साल असम में मिली, जब कांग्रेस को हरा कर वहां सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व में उसकी सरकार बनी। इस साल मणिपुर भी भाजपा की झोली में आ गया। हालांकि इससे पहले पूर्वोत्तर के एक और राज्य- अरुणाचल प्रदेश- को भाजपा अपने नाम कर चुकी थी, पर वह चुनाव के जरिए नहीं, सेंधमारी और जोड़-तोड़ के जरिए हुआ। अलबत्ता मणिपुर में भी भाजपा का बहुमत का दावा केवल अपने दम पर नहीं है, दूसरे दलों से कुछ पाला बदल करा कर ही संभव हुआ है। पर अरुणाचल प्रदेश के विपरीत, यहां भाजपा चुनावी मुकाबले से होकर एक बड़ी ताकत के रूप में उभरी है।

मणिपुर की साठ सदस्यीय विधानसभा में इस बार कांग्रेस को अट्ठाईस सीटें हासिल हुर्इं, बहुमत में सिर्फ तीन की कसर थी। लेकिन सरकार बनी भाजपा की, जिसे इक्कीस सीटें मिली हैं। भाजपा को एनपीपी यानी नेशनल पीपुल्स पार्टी और एनपीएफ यानी नगा पीपुल्स फ्रंट का समर्थन प्राप्त है, जिनके पास चार-चार विधायक हैं। इन दोनों क्षेत्रीय पार्टियां का भाजपा के पक्ष में होना कुछ हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि ये दोनों पार्टियां पहले से ही भाजपा के साथ ‘नेडा’ यानी नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस में शामिल हैं। नेडा का गठन पिछले साल असम में भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी की पहल पर हुआ था। इसके संयोजक हिमंता बिस्व सरमा हैं जो असम की भाजपा सरकार में मंत्री भी हैं। मणिपुर में भाजपा आज जिस ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंची है उसका श्रेय अन्य बातों के साथ-साथ सरमा के चुनाव अभियान प्रबंधन तथा चतुर रणनीति को भी जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा का ग्राफ कितना ऊपर गया है इसका अंदाजा केवल इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2012 में उसे महज दो फीसद वोट मिले थे और इस बार 36.3 फीसद वोट मिले हैं। लेकिन भाजपा ने जिस तरह से बहुमत का इंतजाम किया है वह हमारे लोकतंत्र के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है।

कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद उसके एक और तृणमूल कांग्रेस के भी एक विधायक ने भाजपा का साथ पकड़ लिया। खुद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह हाल तक कांग्रेस में थे और इबोबी सिंह का दाहिना हाथ समझे जाते थे। पिछले साल अक्तूबर में ही वे भाजपा में शामिल हुए। जाहिर है, ऐसी घटनाएं निहित स्वार्थों की ही देन होती हैं। बहरहाल, मणिपुर में भाजपा की सरकार ऐसे वक्त बनी है जब राज्य कई तरह की विकट परिस्थितियों से जूझ रहा है। इनमें सबसे खास है यूनाइटेड नगा काउंसिल द्वारा की गई नाकेबंदी। चार महीने से जारी इस नाकेबंदी के चलते आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं और घाटी के लोगों का बुरा हाल है। विकास-कार्य ठप हैं और भ्रष्टाचार की शिकायत आम है। पाला-बदल का सहारा लेकर मणिपुर में सत्तासीन होने की भाजपा की हसरत तो पूरी हो गई, पर क्या वह लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरेगी? राज्य को नाकेबंदी से मुक्ति दिलाने और घाटी तथा पर्वतीय क्षेत्र के बीच रह-रह उभर आने वाले तनाव का टिकाऊ हल निकालने के अलावा स्थिरता, पारदर्शिता और जवाबदेही के मानकों पर उसे अपने को बेहतर साबित करना होगा।

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First Published on March 17, 2017 3:22 am

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