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मणिपुर की आग

मणिपुर के चूड़ाचंदपुर जिले में शुरू हुई हिंसा और आगजनी दरअसल राज्य सरकार की अदूरदर्शिता और एक संवेदनशील मसले पर सावधानी नहीं बरतने का नतीजा है। जिन विधेयकों के पारित होने के बाद यह हिंसा भड़की, उन पर कुछ जनजातीय समुदायों की तीखी प्रतिक्रिया की आशंका पहले से थी। मगर इसका आकलन और पैदा होने […]
Author नई दिल्ली | September 3, 2015 08:13 am
(फोटो: एएनआई)

मणिपुर के चूड़ाचंदपुर जिले में शुरू हुई हिंसा और आगजनी दरअसल राज्य सरकार की अदूरदर्शिता और एक संवेदनशील मसले पर सावधानी नहीं बरतने का नतीजा है। जिन विधेयकों के पारित होने के बाद यह हिंसा भड़की, उन पर कुछ जनजातीय समुदायों की तीखी प्रतिक्रिया की आशंका पहले से थी।

मगर इसका आकलन और पैदा होने वाले हालात से निपटने के इंतजाम करना सरकार को जरूरी नहीं लगा। इस लापरवाही की वजह से आठ लोगों की जान गई और इकतीस लोग घायल हुए। इस हिंसा की मुख्य वजह सोमवार को विधानसभा में पारित वे तीन विधेयक हैं, जिनमें मणिपुर में स्थानीय लोगों के हितों के संरक्षण का दावा किया गया है।

मणिपुर जन संरक्षण विधेयक, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक और मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक के कानून बन जाने के बाद राज्य के मूल निवासियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भरोसा दिया गया है। लेकिन राज्य के जनजातीय समूह इसलिए विरोध कर रहे हैं कि अगर ये कानून अमल में आए तो मणिपुर हिल पीपुल एडमिनिस्ट्रेशन रेग्युलेशन अधिनियम 1947 के कुछ अहम प्रावधानों का हनन होगा, जो राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में बसने वाले जनजातीय समुदायों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था।

नए कानून के मुताबिक राज्य में संपत्ति का अधिकार सिर्फ उन्हें होगा, जो 1951 से पहले से वहां के बाशिंदे हैं। इसके बाद वहां बसने वालों को यह सुविधा नहीं मिलेगी, इसके अलावा उन्हें राज्य से बाहर भी भेजा जा सकेगा।

गौरतलब है कि जीसीआइएलपीएस नामक संगठन पिछले करीब तीन साल से अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन कर रहा है। संगठन के मुताबिक मणिपुर में बाहरी लोगों की संख्या और दखल लगातार बढ़ रहा है और वे लोग राज्य के मूल निवासियों की जमीन और नौकरी के अवसरों पर कब्जा जमा रहे हैं। इसलिए बाहरी लोगों के राज्य में दाखिल होने पर नियंत्रण लगाने के लिए आइएलपी यानी इनर लाइन परमिट को एक सख्त नियम के रूप में लागू किया जाए।

आइएलपी केंद्र सरकार की ओर से जारी किया जाता है, जिसके तहत भारतीय नागरिकों को संरक्षित या प्रतिबंधित इलाके में सीमित अवधि के लिए यात्रा की मंजूरी दी जाती है। लेकिन संबंधित राज्य के नागरिकों के लिए यह जरूरी नहीं है। दरअसल, इस विवाद की जड़ में पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थानीय मूल निवासियों और बाहर से आकर बसे लोगों से संबंधित मुद्दा ही है, जो समय के साथ और उलझता गया है।

अब सरकार ने नए कानून के तहत राज्य में बाहरी लोगों के जमीन खरीदने के नियम को और सख्त बनाया है, लेकिन इस मसले पर विभिन्न समुदायों को भरोसे में लेने और कानून के व्यावहारिक पहलुओं पर स्पष्ट ब्योरा जारी करने की जरूरत नहीं समझी गई। इसलिए स्वाभाविक ही आदिवासी समुदायों के बीच यह आशंका गहरी हुई कि राज्य में दाखिल होने के लिए परमिट संबंधी नियम का खमियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ सकता है। जाहिर है, अब हालात पर काबू पाने के लिए प्रभावित समुदायों के नुमाइंदों से बातचीत करने से लेकर विधेयकों के सभी प्रावधानों को स्पष्ट करने की जरूरत है।

 

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