ताज़ा खबर
 

अधिग्रहण की गुत्थी

भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को लेकर सरकार की मुश्किलें कुछ और बढ़ गई हैं। इस मसले पर उसकी सहयोगी शिवसेना भी विरोधी खेमे के साथ खड़ी हो गई है। मंगलवार को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के घर हुई बैठक में शिवसेना के नेता भी शरीक हुए। शिवसेना ने स्पष्ट कर दिया है […]
Author July 30, 2015 17:26 pm

भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को लेकर सरकार की मुश्किलें कुछ और बढ़ गई हैं। इस मसले पर उसकी सहयोगी शिवसेना भी विरोधी खेमे के साथ खड़ी हो गई है। मंगलवार को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार के घर हुई बैठक में शिवसेना के नेता भी शरीक हुए। शिवसेना ने स्पष्ट कर दिया है कि यूपीए सरकार के समय पारित भूमि अधिग्रहण कानून में शामिल सहमति और सामाजिक प्रभाव वाले प्रावधान को फिर से जोड़ा जाए।

हालांकि मोदी सरकार ने विपक्षी दलों की तरफ से आई आपत्तियों के मद्देनजर विधेयक के कुछ बिंदुओं पर सुधार का मन बना लिया है। मगर चूंकि इस विधेयक पर एसएस अहलूवालिया की अगुआई वाली संयुक्त संसदीय समिति विचार कर रही है और जल्दी ही वह अपने सुझाव सौंपने वाली है, इसलिए सरकार उसका इंतजार कर रही है।

पखवाड़ा भर पहले मुख्यमंत्रियों की बैठक में सरकार ने संकेत दे दिया था कि राज्य सरकारें अपना स्वतंत्र भूमि अधिग्रहण कानून बना सकती हैं, पर इससे मूल समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यूपीए सरकार के समय बने कानून में प्रावधान है कि अगर कोई निजी कंपनी भूमि अधिग्रहण करना चाहे तो उसे प्रभावित होने वाले अस्सी प्रतिशत लोगों की सहमति अवश्य लेनी होगी। इसी तरह निजी-सार्वजनिक सहभागिता के तहत शुरू होने वाली परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के संबंध में सत्तर प्रतिशत स्थानीय लोगों की रजामंदी जरूरी है। इस प्रावधान को मोदी सरकार ने हटा दिया था। इसके बदले नया नियम बनाया गया कि सरकार या कोई भी निजी कंपनी प्रतिरक्षा के अलावा, ग्रामीण विकास, बिजली परियोजना, गरीबों के लिए आवास आदि बनाने के मकसद से बगैर किसी सहमति के जमीन अधिग्रहीत कर सकती है। इस नियम को यथावत रखते हुए शिवसेना से नजदीकी कायम करना उसके लिए मुश्किल है।

पिछले हफ्ते मंत्रिमंडल की बैठक में जमीन के उचित मुआवजे और अधिग्रहण में पारदर्शिता लाने संबंधी प्रावधान करने पर बातचीत हुई, पर अभी तय नहीं हो पाया है कि इस दिशा में क्या कदम उठाए जाने चाहिए। संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद ही सरकार कोई निर्णय कर सकती है। विधेयक में सहमति वाले बिंदु के अलावा सामाजिक प्रभाव वाले प्रावधान को भी यथावत रखने का दबाव है। मौजूदा कानून में नियम है कि जमीन अधिग्रहीत करने के बाद अगर संबंधित कंपनी पांच साल तक काम नहीं शुरू करती तो स्वत: उसका मालिकाना हक वापस भूस्वामी को मिल जाएगा।

इस नियम को बरकरार रखने की मांग है, मगर मोदी सरकार इसे उचित नहीं मानती। फिर विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अलग-अलग सुझाव हैं। इन सब पर सरकार के रुख को देखते हुए कहना मुश्किल है कि जल्दी कोई तर्कसंगत और व्यावहारिक रास्ता निकल पाएगा। शिवसेना के विरोध में खड़े हो जाने से राज्यसभा में सरकार की स्थिति और कमजोर हो गई है। इस विधेयक पर विपक्ष या फिर केवल शिवसेना नहीं, राजग के कुछ और घटक दलों के नेता भी सहमत नहीं हैं।

स्वदेशी जागरण मंच पहले ही सरकार को संकेत दे चुका है कि किसानों के हितों की अनदेखी करके कोई भी संशोधन नहीं किया जाना चाहिए। इतने दबावों के बाद भी सरकार अगर अपना रुख नहीं बदलती तो उसकी परेशानियां और बढ़ेंगी। संयुक्त संसदीय समिति के सुझाव आने में देरी महज तकनीकी अड़चन हो सकती है। इस आधार पर वह थोड़ी मुहलत भले पा ले, विधेयक पर असहमतियों को लेकर उसे अपना रुख जाहिर करना ही होगा।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग