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कोहेनूर का सपना

महाराजा रणजीत सिंह के बेटे महाराज दलीप सिंह ने अंग्रेजों से हुई एक संधि के तहत कोहेनूर भेंट किया था
Author नई दिल्ली | April 20, 2016 01:33 am
कोहीनूर को भारत वापस लाने की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भारत को कोहीनूर हीरे पर दावा नहीं करना चाहिए।

अपनी अद्वितीयता के लिए मशहूर कोहेनूर हीरे का जब-तब जिक्र लंबे समय से भारत के समृद्ध अतीत और इसकी औपनिवेशक लूट के एक प्रतीक के तौर पर होता रहा है। एक बार फिर यह बातचीत का विषय बन गया है। इसकी वापसी की मांग के मकसद से दाखिल जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से अपना जवाब दाखिल करने को कहा था। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने अदालत में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि कोहेनूर पर भारत दावा नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा किया गया तो दूसरे देश भी हमसे ऐसी वस्तुएं मांग सकते हैं जो उन्होंने हमें भेट-स्वरूप दी हैं और जो हमारे संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। लेकिन कोहेनूर का मामला स्वैच्छिक भेंट का है, या एक विजित देश से बेशकीमती चीजें ले जाने का?

यों तो सिख महाराजा रणजीत सिंह के बेटे महाराज दलीप सिंह ने अंग्रेजों से हुई एक संधि के तहत कोहेनूर भेंट किया था। पर वह संधि मजबूरी की थी। फिर, उस समय महाराजा दलीप सिंह किशोर वय के थे। अलबत्ता कोहेनूर के कई दूसरे दावेदार भी हैं। 1976 में पाकिस्तान ने और 2001 में अफगानिस्तान ने इस पर अपना दावा जताया था। ईरान और बांग्लादेश भी इस पर अपनी दावेदारी जता चुके हैं। कोहेनूर को भारत वापस लाने की याचिका पर संस्कृति मंत्रालय का कहना है कि ब्रिटिश शासकों ने कोहेनूर को न जबरन लिया था और न ही चुराया था। ऐसे में हम उसे वापस नहीं मांग सकते। कानून के लिहाज से यह दलील सही जान पड़ती है। भारत के 1972 के पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम के मुताबिक अवैध रूप से विदेश भेजी गई वस्तुओं पर ही दावेदारी की जा सकती है। इस तरह से कई चीजें आई भी हैं। मसलन, दक्षिण भारत के एक मंदिर से चोरी गई देव-प्रतिमा को आस्ट्रेलिया सरकार ने कुछ समय पहले वापस कर दिया, जो वहां के एक संग्रहालय को बेच दी गई थी।

वर्ष 1972 में बना कानून जहां केवल चोरी-तस्करी के जरिए बाहर गई वस्तुओं पर दावेदारी की बात कहता है, वहीं इसमें यह प्रावधान भी है कि आजादी से पहले बाहर भेजी गई वस्तुओं पर यह कानून लागू नहीं होगा। लेकिन कोहेनूर का आकर्षण ऐसा है कि इसकी वापसी का सपना जब-तब भारतीयों को कुरेदने लगता है। यह बेशकीमती हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा हुआ है और लंदन के एक संग्रहालय में रखा है जहां हर साल लाखों पर्यटक जाते हैं। इस तरह अंग्रेजों की भी भावनाएं इस हीरे के साथ जुड़ी हैं। यही कारण होगा कि जब भी कोहेनूर का मुद््दा भारत में उठा, ब्रिटेन ने इनकार के ही संकेत दिए। उसका अब तक का रुख कोहेनूर की वापसी की उम्मीद नहीं जगाता। पर सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका खारिज नहीं की, यह सोच कर कि याचिका खारिज कर देने पर ब्रिटेन उसे ढाल बना लेगा, कि जब आपकी सर्वोच्च अदालत ने इस मामले को विचारणीय नहीं माना तो हम उस पर क्यों विचार करें। यही नहीं, अदालत ने विदेश मंत्रालय को भी अपना पक्ष रखने का निर्देश दे रखा है। संस्कृति मंत्रालय ने तो वही कहा है जो पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम में है। हो सकता है जब विदेश मंत्रालय का जवाब आए तो उसमें कोई कूटनीतिक रास्ता निकलने की गुंजाइश दिखे।

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