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दहशत के ठिकाने

बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी में लंबे समय तक अस्थिरता का माहौल रहा।
Author नई दिल्ली | February 13, 2017 05:07 am
दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में 10 घंटे तक चले मुठभेड़ में मारे गए संदिग्ध आतंकी को लेकर जाते सुरक्षाबल के जवान। (PTI Photo/13 Feb, 2017)

दक्षिण कश्मीर के कुलवामा इलाके में जिस तरह चार दहशतगर्दों को मार गिराया गया, वह निस्संदेह सेना और खुफिया तंत्र की सतर्कता का सबूत है, पर घाटी में आतंक के सिलसिले को रोकने के उपायों पर गंभीरता से विचार की जरूरत जस की तस बनी हुई है। कुलवामा के एक गांव में लश्करे-तैयबा और जैशे-मोहम्मद से ताल्लुक रखने वाले सात आतंकवादी बैठक करने वाले थे। इसकी सूचना मिलते ही सेना ने गांव को घेर लिया और मुठभेड़ में चार आतंकियों को मार गिराया। बताया जा रहा है कि उनमें से तीन दहशतगर्द गंभीर रूप से घायल अवस्था में फरार हो गए। इन दिनों घाटी में बर्फ होने की वजह से सीमा पार से आतंकवादियों की घुसपैठ काफी कम हो गई है, मगर कश्मीर के स्थानीय दहशतगर्द अब भी अपनी योजनाओं को अंजाम देने के रास्ते तलाशते रहते हैं। दक्षिण कश्मीर आतंकवादियों का गढ़ माना जाता रहा है। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद इस इलाके में अब तक करीब साठ युवा लश्करे-तैयबा, और जैशे-मोहम्मद जैसे पाक समर्थित संगठनों से जुड़ कर आतंक का रास्ता अख्तियार कर चुके हैं। यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय है।

बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी में लंबे समय तक अस्थिरता का माहौल रहा। अब भी स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती। पाकिस्तान से घुसपैठ के जरिए आने वाले दहशतगर्दों पर नजर रखने से बड़ी चुनौती कश्मीर में पैदा हो रहे आतंकवादियों से पार पाने की है। मगर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जिस तरह कश्मीर की आजादी के नारे लगने शुरू हुए और अलगाववादी संगठनों और कट्टरपंथी ताकतों को एक बार फिर अपनी सियासत गरमाने का मौका मिल गया, उससे निपटने के लिए अब तक न तो केंद्र ने कोई व्यावहारिक उपाय निकाला है और न राज्य सरकार ने। जब भी घाटी में अस्थिरता का माहौल बनता है, राज्य सरकार केंद्र का मुंह जोहने लगती है। मगर केंद्र ने इसके लिए पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठा कर मान लिया कि समस्या का समाधान हो जाएगा। पर ऐसा नहीं हो पाया है। घाटी में दहशतगर्दी को स्थानीय लोगों के समर्थन की बड़ी वजह उनकी जरूरतों पर गंभीरता से ध्यान न दिया जाना है। यह भी छिपी बात नहीं है कि वहां आतंकवाद तब तक कमजोर नहीं होगा, जब तक कि स्थानीय लोग उसे समर्थन देना बंद न करें। सिर्फ बंदूक के बल पर दहशतगर्दी को रोकना संभव नहीं होगा, वहां के लोगों का दिल जीतना जरूरी है। पर इस दिशा में व्यावहारिक कदम नहीं उठाए जा पा रहे।

कुछ महीने पहले जब घाटी में स्थिति गंभीर बनी हुई थी, काफी दबाव के बाद केंद्र से एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वहां के लोगों से बातचीत के लिए भेजा गया था। मगर वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा और न उसने ऐसे कोई उपाय सुझाए, जिसके जरिए स्थानीय तौर पर पनप रहे आतंकवाद को रोका जा सके। कश्मीर में अस्थिरता बनाए रखने और आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की भूमिका स्पष्ट है, पर सिर्फ उसी पर ध्यान केंद्रित रखने से सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन वजहों को भी जानना और उनके समाधान के लिए प्रयास करना जरूरी है, जिसके चलते घाटी के युवा गुमराह हो रहे हैं। आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पाकिस्तान पर नकेल कसने के साथ-साथ घाटी के लोगों का मन बदलने का भी प्रयास होते रहना चाहिए।

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