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किले में सेंध

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्रसंघ चुनावों में अमूमन वामपंथी दलों से जुड़े विद्यार्थी संगठनों को कामयाबी मिलती रही है। इस बार भी वे कामयाब हुए हैं। लेकिन एक बड़े उलट-फेर ने वहां पारंपरिक रूप से जीतते आए वामपंथी विद्यार्थी संगठनों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। चार पदों यानी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, […]
Author September 16, 2015 10:27 am

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्रसंघ चुनावों में अमूमन वामपंथी दलों से जुड़े विद्यार्थी संगठनों को कामयाबी मिलती रही है। इस बार भी वे कामयाब हुए हैं। लेकिन एक बड़े उलट-फेर ने वहां पारंपरिक रूप से जीतते आए वामपंथी विद्यार्थी संगठनों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। चार पदों यानी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव के लिए हुए चुनावों में पहले तीन पर तो वामपंथी संगठनों को जीत हासिल हुई, लेकिन चौथे पर भाजपा या संघ परिवार से संबद्ध एबीवीपी यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कब्जा जमाया। बाकी के तीन पदों पर भी एबीवीपी की स्थिति बहुत खराब नहीं रही और वह दूसरे या तीसरे स्थान पर रही।

गौरतलब यह भी है कि इस बार एबीवीपी ने काउंसलर के इकतीस में से ग्यारह पद भी झटक लिए। जाहिर है, जेएनयू में लंबे समय के बाद ऐसी सफलता एबीवीपी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह चुनाव भाकपा (माले) से जुड़े आइसा यानी आॅल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के लिए ज्यादा नुकसानदेह रहा, क्योंकि इससे पहले हुए चुनाव में उसने केंद्रीय पैनल के चारों पदों पर जीत दर्ज की थी। इस बार उसे केवल उपाध्यक्ष और महासचिव पद से संतोष करना पड़ा, जबकि अध्यक्ष पद पर अप्रत्याशित रूप से भाकपा से जुड़े एआइएसएफ ने बाजी मारी। कांग्रेस से जुड़े संगठन एनएसयूआइ के लिए यह चुनाव एक बार फिर निराशाजनक रहा। यों कुल पड़े वोट और अलग-अलग संगठनों को मिले मतों के हिसाब से देखा जाए तो एबीवीपी को मुख्य रूप से वामपंथी विद्यार्थी संगठनों के बिखराव या उनके अलग-अलग लड़ने का फायदा मिला।

यह माना जाता रहा है कि जेएनयू परिसर में दक्षिणपंथ की राजनीति को इसलिए कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिल पाएगी, क्योंकि यहां परंपरागत रूप से वामपंथी रुझान हावी रहा है। लेकिन सच यह है कि इससे पहले, 2001 के चुनाव में एबीवीपी को इससे कहीं बड़ी सफलता मिली थी, उसने अध्यक्ष पद हासिल किया था। इससे पहले कई ऐसे मौके आए जब वामपंथी विद्यार्थी संगठनों ने छात्रसंघ चुनाव आपसी तालमेल से लड़ा। उन्हें इसका फायदा भी मिला। लेकिन इस बार एआइएसएफ, एसएफआइ, एआइएसए और डीएसफ के बीच तालमेल की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। नतीजतन सबने अलग-अलग उम्मीदवार खड़े किए। जाहिर है, इन संगठनों के बीच वोटों के बिखराव का सीधा लाभ एबीवीपी को हुआ।

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव यों तो केवल परिसर के भीतर संगठनों के बीच नुमाइंदगी के लिए आयोजित गतिविधि है। लेकिन इसकी अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमूमन देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की नजर जेएनयू चुनाव और उसके नतीजों पर रहती है। कई बार इसे देश के चुनावी मिजाज का संकेत भी मान लिया जाता है, क्योंकि परिसर के भीतर शैक्षिक गतिविधियों से लेकर छात्रावास और दूसरी सुविधाओं के अलावा राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे भी चुनावी बहसों के केंद्र में होते हैं। बहरहाल, जेएनयू छात्रसंघ के इस साल के चुनाव पर राष्ट्रीय राजनीति और उससे जुड़े मुद्दों की छाप भी साफ दिखी।
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