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अवकाश की राजनीति

किसी राजनीतिक दल के सत्ता में आने के बाद अपनी विचारधारा से जुड़े लोकप्रिय नेताओं के नाम पर सड़कों, भवनों, योजनाओं या कार्यक्रमों की शुरुआत एक आम रिवायत-सी बन चुकी है। कुछ जानी-मानी शख्सियतों के जन्मदिन या पुण्यतिथि के दिन राजकीय अवकाश घोषित करना भी इसी की कड़ी है। यों यह प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक […]
Author April 24, 2015 13:50 pm

किसी राजनीतिक दल के सत्ता में आने के बाद अपनी विचारधारा से जुड़े लोकप्रिय नेताओं के नाम पर सड़कों, भवनों, योजनाओं या कार्यक्रमों की शुरुआत एक आम रिवायत-सी बन चुकी है। कुछ जानी-मानी शख्सियतों के जन्मदिन या पुण्यतिथि के दिन राजकीय अवकाश घोषित करना भी इसी की कड़ी है। यों यह प्रवृत्ति किसी एक राजनीतिक दल या एक राज्य तक सीमित नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे आगे दिखता है। राज्य में सार्वजनिक अवकाशों की संख्या में पिछले दस साल के दौरान पचास फीसद का इजाफा हुआ है और आज वहां साल भर में सैंतीस दिन छुट्टियों के हो गए हैं। ये साप्ताहिक अवकाशों के अलावा तय छुट्टियां हैं। यह समझना मुश्किल नहीं है कि पहले से कर्मचारियों की कमी से जूझते महकमों में लंबित कामों की क्या हालत होगी? सियासी समीकरण साधने की गरज से छुट्टियों के निर्धारण का कोई औचित्य नहीं है।

वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने इस मसले पर उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ के समक्ष दाखिल याचिका में ठीक ही यह सवाल उठाया है कि उत्तर प्रदेश में सरकारें पिछले कई साल से ‘अवकाश की राजनीति’ कर रही हैं और इसका शासन-व्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है; इसलिए तयशुदा अवकाश नीति बना कर क्यों नहीं इसका तत्काल नियमन किया जाना चाहिए! अदालत ने इस मसले पर सरकार से जवाब-तलब किया है। अब नियमावली में दर्ज तकनीकी व्यवस्था की व्याख्या और उस पर फैसला तो अदालत करेगी कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है या फिर राज्य सरकारें भी ऐसा कर सकती हैं। लेकिन सार्वजनिक छुट्टियों के लिए कुछ खास दिनों के चुनाव की सियासत को समझना मुश्किल नहीं है।

दरअसल, इसके पीछे मकसद जितना संबंधित शख्सियतों के प्रति सम्मान प्रकट करना होता है, उससे ज्यादा मंशा यह होती है कि उनके नाम पर सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के साथ-साथ कुछ खास सामाजिक वर्गों के बीच अपनी पैठ बढ़ाई जाए और चुनावों में इसका फायदा उठाया जाए। पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश में दिवंगत महत्त्वपूर्ण शख्सियतों को एक तरह से राजनीति का मोहरा बनाया जा रहा है। आमतौर पर आंबेडकर जयंती पर छुट्टी घोषित होती रही है। कुछ समय पहले राज्य की समाजवादी पार्टी की सरकार ने छह दिसंबर को आंबेडकर की पुण्यतिथि के दिन अवकाश की घोषणा की।

इससे पहले सपा सरकार ने ही मायावती सरकार की ओर से बाबासाहेब के निर्वाण दिवस और कांशीराम के जन्मदिन पर घोषित छुट्टियां रद्द कर दी थीं। जाहिर है, समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर बाबासाहेब के निर्वाण दिवस के दिन छुट्टी की घोषणा इसलिए की कि दलित समुदाय को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके। कुछ समुदायों को खुश करने के इरादे से अवकाश का सहारा लेने के सिलसिले में अखिलेश यादव की सरकार ने परशुराम जयंती, महर्षि कश्यप और महर्षि निषादराज जयंती, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के जन्मदिन भी अवकाश की सूची में जोड़ दिए हैं। एक छुट््टी हजरत अजमेरी गरीब नवाज के उर्स के मौके पर भी घोषित की गई है। हमारे देश की संस्कृति और इतिहास इतना विस्तृत है कि सभी समुदायों का कोई न कोई प्रतीक-व्यक्तित्व बताया जा सकता है। एक से अधिक नाम भी लिए जा सकते हैं। क्या सभी के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए सार्वजनिक अवकाश घोषित करना जरूरी है? क्या इसके लिए दूसरे तरीके नहीं अपनाए जा सकते? अवकाश के दिन राजनीतिक हितों के हिसाब से क्यों तय होने चाहिए?

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