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जनसत्ता संपादकीय : बगदाद में कहर

आइएस ने जिस तरह चुन कर दो शियाबहुल इलाकों में कहर बरपाया है उसके पीछे निश्चय ही एक खास मकसद शिया-सुन्नी तनाव को बढ़ाने और लड़ाई का रूप देने का रहा होगा।
Author नई दिल्ली | July 5, 2016 01:09 am
आईएसआईएस। (Photo: AP)

इतने कम अंतराल पर इतने बड़े दो आतंकी हमले शायद ही पहले कभी हुए हों। ढाका में आतंकी हमले की खबर आई ही थी कि इराक की राजधानी में उससे भी बड़ा आतंकी हमला हो गया। ढाका की तरह बगदाद में हुए हमले की भी जिम्मेवारी आइएस ने ली है। यों ढाका कांड की बाबत आइएस के दावे को बांग्लादेश की सरकार सही नहीं मानती, और उसने स्थानीय कट्टरपंथी गुटों तथा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ की तरफ उंगली उठाई है। पर बगदाद में हुए हमले को अंजाम देने के आइएस के दावे पर किसी ने शक नहीं जताया है। इसके पहले भी बगदाद में आइएस ऐसे कई कांड कर चुका है। अलबत्ता इस साल बगदाद में यह उसका सबसे बड़ा कहर है। खबरों के मुताबिक यह फिदायीन हमला था और इसमें करीब दो सौ लोग मारे गए हैं, जिनमें कई महिलाएं और बच्चे भी थे।

रमजान के महीने के आखिर में हुए इस हमले ने ईद जैसे मुसलिम समुदाय के सबसे खुशी के मौके को गम में बदल दिया है। रमजान के महीने में ही, जो मुसलिम समुदाय का सबसे पवित्र महीना माना जाता है, उसने इस्तांबुल के अतातुर्क अंतरराष्ट्रीय हवाई अड््डे पर हमला किया और इसी महीने में बगदाद को लहूलुहान कर दिया। ढाका और अफगानिस्तान में हाल में हुए हमले भी रमजान के महीने में हुए। इससे जाहिर है कि आइएस, अल कायदा समेत आतंकी संगठनों के लिए इस्लाम का नाम सिर्फ अपनी गिरोहबंदी का जरिया है। बगदाद में हुए ताजा हमले के लिए आइएस ने मध्य बगदाद के पड़ोस के कारदा को चुना, जो शिया आबादी का इलाका है, और वक्त ऐसा चुना जब बाजार में काफी भीड़भाड़ रहती है। त्योहार के मद््देनजर भीड़ सामान्य दिनों से भी कुछ अधिक थी। इस तरह हमले के पीछे की मंशा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, ज्यादा से ज्यादा लोग मारे जाएं और ज्यादा से ज्यादा खौफ पैदा हो।

गौरतलब है कि रविवार को ही, बगदाद के एक और शिया बहुल इलाके अल-शाब में धमाका हुआ जिसमें पांच लोगों के मारे जाने की खबर है। इराक में शिया-सुन्नी तनाव कोई नई बात नहीं है। आइएस ने जिस तरह चुन कर दो शियाबहुल इलाकों में कहर बरपाया है उसके पीछे निश्चय ही एक खास मकसद शिया-सुन्नी तनाव को बढ़ाने और लड़ाई का रूप देने का रहा होगा। यों जमीनी कब्जे के लिहाज से पिछले दिनों आइएस को धक्का लगा है, फालुजा को उसके कब्जे से इराकी सैनिकों ने छुड़ा लिया है, जहां से वह बगदाद पर अपने हमलों को अंजाम देता था। पर इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर मोसुल अब भी आइएस के कब्जे में है। इससे ज्यादा खतरनाक बात उसकी आतंकी फितरत है। लेकिन अब भी आइएस से लड़ने के लिए न तो अपेक्षित सतर्कता बरती जा रही है न रणनीति। यह हैरानी का विषय है कि आइएस, तमाम चेकपोस्टों के बावजूद, भारी मात्रा में विस्फोटक कारदा के अपने निशाने तक ले जाने में कामयाब रहा। सुरक्षा बंदोबस्त को लेकर इराकी जनता में पहले से नाराजगी रही है, ताजा हमले के मद््देनजर वह गुस्से की शक्ल में फूट रही है। डर इस बात का है कि कहीं शिया-सुन्नी तनाव नियंत्रण की हद के बाहर न चला जाए। अगर ऐसा हुआ तो आइएस की ही मंशा पूरी होगी। लिहाजा, आइएस से निपटने में संकल्प के साथ-साथ सावधानी भी जरूरी है।

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