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जनसत्ता संपादकीय : मायूसी में उत्सव

इस बार ओलंपिक खेलों में जिस उत्साह और उम्मीद के साथ खिलाड़ियों को भेजा गया, उसके मुताबिक नतीजे निराशाजनक ही रहे।
Author नई दिल्ली | August 20, 2016 06:20 am
सिंधू को फाइनल में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी और दो बार विश्व बैडमिंटन चैम्पियन कैरोलिना मारिन से भिड़ना था। सिंधू ने कैरोलिना को अच्छी टक्कर भी दी लकेिन वो मैच जीत नहीं सकीं।

इस बार ओलंपिक खेलों में जिस उत्साह और उम्मीद के साथ खिलाड़ियों को भेजा गया, उसके मुताबिक नतीजे निराशाजनक ही रहे। आखिरी दौर में दो महिला खिलाड़ियों ने लाज रख ली। बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू अब तक के ओलंपिक इतिहास में पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गर्इं जो फाइनल तक पहुंचीं और रजत पदक हासिल किया। इस खेल के जरिए उन्होंने अपने जीवन के कई रिकार्ड भी बदल डाले। अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन की रैंकिंग में सिंधू का स्थान दुनिया के खिलाड़ियों में दसवां है। दूसरे नंबर की खिलाड़ी चीन की वांग यिहान को हरा कर सिंधू सेमीफाइनल में पहुंचीं और वहां उन्होंने छठे नंबर की खिलाड़ी जापान की निजोमी ओकुहारा को परास्त कर दिया। ओकुहारा के साथ उनका पिछला रिकार्ड एक-तीन का था, लेकिन सिंधू अच्छी रणनीति के साथ मैदान में उतरीं और अपना वह रिकार्ड सुधार कर दो-तीन कर लिया। अंतिम चरण में उन्होंने नंबर एक खिलाड़ी और विश्वविजेता स्पेन की कैरोलिन मारिन का मुकाबला किया।

पिछले साल डेनमार्क ओपन में खेलते हुए उन्होंने सेमीफाइनल में मारिन को शिकस्त दी थी। ओलंपिक में जिस तरह उन्होंने मारिन को उलझाए रखा वह उनके कुशल खेल का परिचायक था। सिंधू के खेल की दुनिया भर के खिलाड़ियों ने तारीफ की। जाहिर है कि सिंधू ने न सिर्फ ओलंपिक के लिए कड़ी मेहनत की थी, बल्कि सूझ-बूझ, रणनीतिक तैयारी और विपक्षी खिलाड़ी को उलझाए रखने का कौशल भी अर्जित किया था। इस बार के ओलंपिक खेलों में जिस तरह से खिलाड़ियों ने निराश किया उसमें सिंधू की यह कामयाबी निस्संदेह गर्व का विषय है। पिछले दो-तीन ओलंपिक के मुकाबले इस बार खिलाड़ियों का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। ऐसे में उचित ही यह बहस भी छिड़ गई है कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में अच्छे खिलाड़ी तैयार करने में सफलता क्यों नहीं मिल पा रही है।

इस बार का ओलंपिक सरकारों और खेल संघों के लिए बड़ा सबक होना चाहिए। जब खिलाड़ी ओलंपिक में पदक लेकर आते हैं तो सरकारें उनके लिए बड़े-बड़े इनाम-इकराम घोषित करने में जुट जाती हैं, पर अगले खेलों में खिलाड़ियों की तैयारियों को लेकर फिर वही लापरवाही दिखने लगती है। दुनिया के उन्नत देशों से होड़ लेने का दम तो भरा जाता है, पर जिस तरह खिलाड़ियों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उसकी पहल कहीं नहीं दिखती। ओलंपिक में पहुंचने वाले ज्यादातर खिलाड़ी शुरू में अपने दम पर खेलते और पहचान बनाते हैं, फिर राजनीति की शिकार चयन प्रक्रिया से गुजरते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों तक पहुंचते हैं। खेलों में रुचि रखने वाले बच्चों की पहचान करने और सरकारी प्रयास से उन्हें तैयार करने की कोई व्यावहारिक व्यवस्था नहीं है।

ज्यादातर खिलाड़ी अच्छे मैदानों, खेल संसाधनों और उचित प्रशिक्षण के अभाव में केवल अपने जुनून के बल पर आगे बढ़ पाते हैं। खेल संघों पर हावी राजनीति इस दशा के लिए जिम्मेदार है। प्रशिक्षकों के चुनाव और खेलों में उन्हें साजो-सामान उपलब्ध कराने, चिकित्सकों आदि की तैनाती को लेकर अक्सर विवाद उठते रहे हैं। इस बार रियो जाने से पहले दो पहलवानों के चयन और फिर डोपिंग को लेकर जिस तरह विवाद उठे उससे खेल में राजनीति और खेल संबंधी सुविधाओं को लेकर भारत को किरकिरी झेलनी पड़ी। पता नहीं कब सरकार और खेल संघ इससे कब सबक लेंगे और महज एक-दो पदक मिलने पर उत्सव मनाने के बजाय बेहतर उपलब्धि के लिए जरूरी तैयारियों की तरफ ध्यान देंगे।

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