ताज़ा खबर
 

जनसत्ता संपादकीय : राज्यसभा की डगर

राज्यसभा के अभी संपन्न हुए चुनाव को लेकर उत्सुकता इस खास वजह से थी कि इसके नतीजे सदन के मौजूदा समीकरण को किस हद तक प्रभावित कर पाएंगे और आखिरकार सदन की नई तस्वीर क्या होगी।
Author नई दिल्ली | June 13, 2016 00:43 am
संसद भवन (EXPRESS PHOTO)

राज्यसभा के अभी संपन्न हुए चुनाव को लेकर उत्सुकता इस खास वजह से थी कि इसके नतीजे सदन के मौजूदा समीकरण को किस हद तक प्रभावित कर पाएंगे और आखिरकार सदन की नई तस्वीर क्या होगी। लेकिन चुनाव संपन्न होते-होते राजनीति में गिरावट का दृश्य प्रमुख हो गया। विधायक दल में बगावत, पाला-बदल मतदान और धनबल के इस्तेमाल व प्रभाव के वाकये हमारे लोकतंत्र के लिए कोई शुभ संकेत नहीं हैं। मजे की बात है कि कोई भी पार्टी, चाहे उसके घोषित उद््देश्य व दावे कुछ भी हों, इस पतनशीलता से बची नहीं है। सबको बगावत तथा पाला-बदल का नुकसान उठाना पड़ा, अलबत्ता कांग्रेस को सबसे ज्यादा। हरियाणा में उसके चौदह विधायकों के वोट खारिज हो गए, क्योंकि उन्होंने गलत पेन का इस्तेमाल किया। हरियाणा में पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड््डा निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने के पार्टी के फैसले से नाराज थे और उनके समर्थक विधायकों ने निर्णायक क्षणों में गुल खिला दिया। अब वहां हार के बाद कांग्रेस कह रही है कि वह हुड््डा से स्पष्टीकरण मांगेगी; उन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।

लेकिन कांग्रेस की हालत इस वक्त ऐसी है कि वह शायद ही अपने किसी क्षत्रप के खिलाफ कठोर कदम उठा सके। झारखंड का वाकया भी कम नाटकीय नहीं है जहां झारंखड मुक्ति मोर्चा के एक विधायक को मतदान से ऐन पहले 2013 के हाथापाई के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप लग रहे हैं कि इस गिरफ्तारी का असल मकसद भाजपा-समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार की जीत का रास्ता साफ करना था। कर्नाटक में जनता दल (एस) के आठ विधायकों ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार के बजाय कांग्रेसी उम्मीदवार को वोट दिए, तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पांच विधायकों ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट नहीं डाले। विधायकों को पाला-बदल और खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए पार्टियां जिस तरह परेशान रहीं वह भी हमारे लोकतंत्र का एक बहुत चिंताजनक प्रसंग है।

पिछले महीने राज्यसभा की सत्तावन सीटें खाली हुई थीं जिनमें से तीस सीटों पर निर्विरोध चुनाव हुए। बाकी सत्ताईस सीटों के दो दिन पहले हुए चुनाव में भाजपा को ग्यारह, कांग्रेस को छह, सपा को सात, बसपा को दो और एक सीट भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार को मिली है। जाहिर है, राज्यसभा में भाजपा की ताकत बढ़ी है और कांग्रेस की थोड़ी कम हुई है। भाजपा पहली बार राज्यसभा में पचास के ऊपर पहुंची है और कांग्रेस का ग्राफ पहली बार साठ के नीचे आया है। लेकिन कांग्रेस अब भी ऊपरी सदन में सबसे बड़ी पार्टी है। गठबंधन के लिहाज से देखें तो यूपीए की तुलना में भाजपा के नेतृत्व वाला राजग बढ़त में आ गया है। राज्यसभा में राजग के पांच सदस्य बढ़े हैं, जबकि यूपीए के तीन घटे हैं।

अब राजग के पास चौहत्तर राज्यसभा सांसद हैं तो यूपीए के पास इकहत्तर। पर दो सौ पैंतालीस सदस्यों वाले इस सदन में गैर-राजग और गैर-यूपीए सदस्यों की कुल तादाद नवासी है, यानी उन्हीं की सम्मिलित संख्या सबसे अधिक है। जाहिर है, अपनी थोड़ी बढ़ी हुई ताकत के बावजूद राज्यसभा की डगर अब भी सत्तापक्ष के लिए आसान नहीं है और अगले लोकसभा चुनाव तक ऊपरी सदन में उसके बहुमत में आ पाने की कोई संभावना नहीं दिखती। लिहाजा, जीएसटी समेत अहम विधेयकों पर राज्यसभा की सहमति हासिल करने के लिए विपक्षी दलों से संवाद और उनके सुझावों को यथासंभव समाहित करने की जरूरत बनी हुई है। इस तकाजे को पूरा करने से हमारे लोकतंत्र को मजबूती ही मिलेगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग