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रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण

व्यंग्यचित्रों की दुनिया में वे ‘आम आदमी’ के रचनाकार थे और वही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। यों किस्से-कहानियों में तो ऐसे नायक मिल जाते हैं, जो समाज के वंचित तबकों के हक और तकलीफों के लिए लड़ते हैं, लेकिन असल जिंदगी में ऐसे लोग कम दिखते हैं। आरके लक्ष्मण यानी रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण को […]
Author January 28, 2015 18:01 pm

व्यंग्यचित्रों की दुनिया में वे ‘आम आदमी’ के रचनाकार थे और वही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। यों किस्से-कहानियों में तो ऐसे नायक मिल जाते हैं, जो समाज के वंचित तबकों के हक और तकलीफों के लिए लड़ते हैं, लेकिन असल जिंदगी में ऐसे लोग कम दिखते हैं। आरके लक्ष्मण यानी रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण को ऐसे ही नायक के तौर पर देखा जा सकता है, जिसने एक बार आम आदमी की जिंदगी की हकीकत को व्यंग्यचित्रों के रूप में उकेरना शुरू किया तो उसके बाद तकरीबन छह दशक तक वे उसी की सहज भावनाओं और सामान्य समस्याओं को आवाज देते रहे। उनके बारे में यह एक दिलचस्प तथ्य है कि वे ऐसे कलाकार थे, जिसने अपने आप को खुद सिखाया। तीन साल की उम्र से ही उन पर चित्र बनाने का जुनून सवार हो गया था। अभिभावकों से पिटाई के बावजूद वे अपने मैसूर के घर की दीवारों और फर्श पर रेखाएं खींचते रहते थे। पिता के निधन के बाद बहुत कम उम्र में ही उनके सामने कई मुश्किलें खड़ी हो गई थीं। हाई स्कूल के बाद ऊंची पढ़ाई के लिए उन्होंने जब मुंबई के जेजे स्कूल में आवेदन दिया तो वहां उनके चित्रों को कमतर बता कर दाखिला देने से मना कर दिया गया। लेकिन कुछ बड़े होने पर उनकी प्रतिभा निखर कर सामने आई, जब उन्होंने कई दूसरी चीजों के साथ-साथ अपने भाई और मशहूर उपन्यासकार आरके नारायण की कहानियों के रेखाचित्र बनाए। बाद के दिनों में वे पश्चिम के विख्यात व्यंग्य-चित्रकार सर डेविड लो से प्रभावित हुए। ‘स्वराज्य’ और ‘ब्लिट्ज’ जैसे प्रकाशनों और ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ के लिए अलग-अलग विषयों पर कार्टून बनाते हुए वे टाइम्स आॅफ इंडिया अखबार से जुड़े और उसके लिए करीब पचास साल तक काम किया। वहीं उन्होंने पहली बार आम आदमी को अपने काम का विषय बनाया और महंगाई, बेरोजगारी जैसे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े सवालों, उसकी मायूसी, अंधेरे, उजाले, खुशी और गम को अपने व्यंग्यचित्रों में उकेरने लगे।

जिस तरह अपनी जिंदगी को प्रभावित करने वाले राजनीतिक फैसलों, घटनाओं, दृश्य-पटल पर दिखने वाली तमाम गतिविधियों और समस्याओं को हाशिये पर खड़ा एक आदमी दूर से देखता, समझता और झेलता तो है, मगर कुछ बोल नहीं पाता, उसी तरह आरके लक्ष्मण के कार्टून का आम आदमी कहीं किसी कोने से या बैठक के पीछे से झांकता एकबारगी खास स्थिति पर तंज करता नजरों के सामने से गुजर जाता था। यह एक तरह से सत्ता को बताना था कि जनता सब देख और समझ रही है। दरअसल, इस ‘कॉमन मैन’ के जरिए आरके लक्ष्मण सत्ता के सामने एक सीमा रेखा खींचते थे, यह याद दिलाने के लिए कि उसकी जवाबदेही क्या है। मगर कार्टूनों में उनका हास्य या विनोद हर बार लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट ही नहीं लाता था, बल्कि अक्सर वे राजनीतिकों के भ्रष्टाचार और शोषण के मामलों पर तीखा तंज करते थे, जो लोगों को स्तब्ध कर जाता था। उनके व्यक्तित्व को इस तरह समझा जा सकता है कि अपने सरोकारों को लेकर प्रतिबद्धता पर किसी ऊंचे रसूख वाले व्यक्ति या नेता का असर न पड़े, इसके लिए उन्होंने आमतौर पर राजनीतिकों से मिलने से परहेज किया। उनके काम को स्वीकृति इस रूप में भी मिली कि उन्हें मैगसेसे, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सम्मानों से नवाजा गया। उनके जाने के बाद चेहरे पर मुस्कान लाने और कुछ कड़वे यथार्थ से रूबरू कराने वाले कार्टूनों की दुनिया का एक कोना खाली हो गया है।

 

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