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उपभोक्ता की मुश्किल

मोदी सरकार का एक साल पूरा होने वाला है। जाहिर है, इस अवसर पर सत्तापक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाएगा और विपक्ष बताएगा कि क्या-क्या वादे किए गए थे और सरकार की क्या-क्या नाकामी रही। आर्थिक मोर्चे पर देखें तो तस्वीर मिली-जुली ही नजर आती है। सरकार को सबसे बड़ी सफलता राजकोषीय घाटे को कम करने में […]
Author May 21, 2015 00:18 am

मोदी सरकार का एक साल पूरा होने वाला है। जाहिर है, इस अवसर पर सत्तापक्ष अपनी उपलब्धियां गिनाएगा और विपक्ष बताएगा कि क्या-क्या वादे किए गए थे और सरकार की क्या-क्या नाकामी रही। आर्थिक मोर्चे पर देखें तो तस्वीर मिली-जुली ही नजर आती है। सरकार को सबसे बड़ी सफलता राजकोषीय घाटे को कम करने में मिली है। ताजा अनुमान के मुताबिक राजकोषीय घाटा जीडीपी के चार फीसद तक आ गया है। जबकि यूपीए सरकार की विदाई के समय यह 4.4 फीसद था। मोदी सरकार के आने के बाद से कुल मिला कर शेयर बाजार में तेजी भी बनी रही है। हाल में उद्योग संगठन एसोचैम ने मोदी सरकार को दस में सात नंबर देकर उसकी सराहना की। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। नेल्सन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले वित्तवर्ष में उपभोक्ता सामान की खरीद में जबर्दस्त कमी दर्ज हुई है, यह गिरावट पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा है। मार्च में समाप्त हुए साल में उपभोक्ता बाजार की वृद्धि दर साढ़े सात फीसद रही, जबकि उससे पहले के साल में 10.6 फीसद। इससे पहले एक अंक में वृद्धि दर 2004-05 में दर्ज हुई थी, पर वह भी ताजा आंकड़े से आधा फीसद अधिक थी, यानी आठ फीसद। उसे सूखे का असर माना गया था।

उद्योग जगत को उम्मीद है कि उपभोक्ता सामान की खरीद में आई सुस्ती टूटेगी। पर मानसून सामान्य से कमजोर रहा, जिसकी भविष्यवाणी मौसम विभाग ने कर रखी है, तो स्थिति और खराब हो सकती है। पहले ही बेमौसम की बारिश के कारण फसलों को हुए नुकसान ने किसानों को मुसीबत में डाल रखा है। हमारे देश में दो तिहाई आबादी गांवों में रहती है। इसलिए कृषि पर संकट गहराने का व्यापक असर उपभोक्ता बाजार पर भी पड़ता है। लोग खाने-पीने और रोजमर्रा की दूसरी चीजों को खरीदे बिना नहीं रह सकते, मगर टीवी, फ्रिज, वाहन आदि टिकाऊ उपभोक्ता सामान तभी खरीदते हैं जब बचत की थोड़ी गुंजाइश हो। उपभोक्ता सामान की बिक्री में पिछले एक दशक की सबसे बड़ी सुस्ती आम लोगों की आय न बढ़ने और बचत के मौके सिकुड़ते जाने की ओर ही इशारा करती है। यह महंगाई बढ़ने का भी संकेत है। यह भी गौरतलब है कि उपभोक्ता सामान की खरीद में गिरावट शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में दर्ज हुई है। सरकार चाहती है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कुछ कमी करे, ताकि बाजार को प्रोत्साहन मिले। लेकिन बीमारी इतनी व्यापक है कि वह कर्ज की खुराक से दूर नहीं हो सकती। यह बीमारी तभी दूर हो सकती है जब आम लोगों की भी क्रय-शक्ति बढ़े। लेकिन इसकी परवाह किसे है?

सरकार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के चार फीसद तक लाकर अपनी पीठ थपथपा रही है। लेकिन यह उपलब्धि कर-राजस्व में बढ़ोतरी के बूते नहीं, बल्कि योजना मद में कटौती के सहारे हासिल की गई है। मनरेगा समेत अनेक ऐसी योजनाओं के आबंटन घटा दिए गए जो कमजोर तबकों के सशक्तीकरण से ताल्लुक रखती हैं। गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर बकाया इक्कीस हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। यूपीए सरकार के दस साल के दौरान राजकोषीय घाटा भले चिंताजनक स्तर पर था, मगर योजना-व्यय में कभी कटौती नहीं की गई, तब भी नहीं, जब देश मंदी से जूझ रहा था। संगठित क्षेत्र के एक छोटे-से हिस्से को छोड़ दें, तो बाकी लोग अपने को ठगा हुआ महसूस करते हैं। न तो महंगाई के अनुुपात में उनकी आय बढ़ी है न उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। उपभोक्ता सामान की बिक्री में आई गिरावट को लेकर केवल बाजार की चिंता करना बेहद संकीर्ण नजरिया होगा। इस पर आम लोगों की क्रय-शक्ति के लिहाज से सोचने की जरूरत है।

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  1. Santosh Makharia
    May 21, 2015 at 5:54 pm
    जो कभी साठ साल में नही हुआ ....................वो कार्य एक वर्ष में ही हो गया जी ..................भक्तों को आटे दाल का बाजार भाव ??????न निगलते बनता है न उगलते /
    (0)(0)
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