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प्रचार में सरकार

दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में जिस तरह भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेताओं को लगा दिया है, वैसा शायद पहले कभी किसी चुनाव में नहीं देखा गया। बजट सत्र नजदीक आ रहा है, सबका ध्यान बजट पर लगा हुआ है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगभग पूरा मंत्रिमंडल चुनाव प्रचार में उतरा हुआ है। खुद […]
Author January 31, 2015 16:34 pm

दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में जिस तरह भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेताओं को लगा दिया है, वैसा शायद पहले कभी किसी चुनाव में नहीं देखा गया। बजट सत्र नजदीक आ रहा है, सबका ध्यान बजट पर लगा हुआ है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगभग पूरा मंत्रिमंडल चुनाव प्रचार में उतरा हुआ है। खुद नरेंद्र मोदी की रैलियां तय की जा चुकी हैं। वे लगातार चुनाव को लेकर पार्टी की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं। पहले किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो उनको आगे करके सारा प्रचार चल रहा था। किरण बेदी ने अपना घोषणापत्र भी पेश कर दिया। मगर अब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रचार का रुख मोड़ कर मोदी पर केंद्रित कर दिया है। मोदी के नाम पर वोट मांगे जाने लगे हैं। पार्टी नया दृष्टिपत्र लाने वाली है। इसकी वजहें छिपी नहीं हैं। किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने और बाहर से आए नेताओं को अहमियत देते हुए टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष पैदा हो गया था। कार्यकर्ताओं में अपेक्षित उत्साह नहीं दिखाई दे रहा था। लिहाजा फिर एक बार मोदी को चेहरा बना दिया गया। मगर इसके पीछे वजह सिर्फ यही नहीं है। भाजपा ने मान लिया है कि उसे कड़ी चुनौती मिल रही है। सर्वेक्षणों में लगातार उसकी स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है।

ऐसे में पार्टी की घबराहट समझी जा सकती है। यही वजह है कि दो दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे एकजुट होकर कबड्डी टीम के खिलाड़ियों की तरह घेरा बना कर दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों का साथ दें। उसके बाद अमित शाह ने हर विधानसभा क्षेत्र के लिए अलग-अलग सांसदों को चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी और जवाबदेही सौंप दी। इस तरह एक सौ बीस सांसद प्रचार में उतरे हैं। तेरह राज्यों से कार्यकर्ताओं के दल बुलाए गए हैं। अगले सात दिनों में ढाई सौ रैलियों की रूपरेखा तय कर दी गई है। फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी के नाम चार रैलियां तय हैं, मगर लोगों के उत्साह को देखते हुए उनमें और बढ़ोतरी की जा सकती है। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि केंद्र सरकार का कामकाज कैसे चलेगा।

अब तक किसी प्रधानमंत्री को इस तरह विधानसभा चुनावों में रैलियां करते नहीं देखा गया। यह अकेले दिल्ली का मामला नहीं है, नरेंद्र मोदी अमेरिका यात्रा से लौटे तो सीधे महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव प्रचार में चले गए। अब दिल्ली के चुनाव में सक्रिय हैं। समझना मुश्किल है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह हैं, जबकि पार्टी के कामकाज में दिलचस्पी प्रधानमंत्री की क्यों अधिक दिखाई देती है। प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे सरकार के कामकाज पर ध्यान केंद्रित करें।
लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने जिस तरह लोगों में बेहतर कामकाज और विकास संबंधी कार्यों की उम्मीद जगाई थी, लोग उन्हें पूरा होते देखने की उम्मीद पाले हुए हैं, मगर उन्हें पार्टी के एजेंडे ज्यादा महत्त्वपूर्ण नजर आ रहे हैं। एक समय भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी को भी चेहरा बना कर चुनाव लड़ा था, मगर वे कभी इस तरह सरकार का कामकाज छोड़ कर विधानसभा चुनावों में प्रचार करने नहीं गए। बजट पेश करने के दिन नजदीक आ रहे हैं, मगर केंद्रीय वित्तमंत्री को दिल्ली विधानसभा चुनावों पर नजर रखने, रणनीति बनाने के काम में लगा दिया गया है। इस मौके पर दूसरे मंत्रियों को भी अपने विभागों का लेखाजोखा तैयार करना होता है, मगर वे चुनाव प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में समझना मुश्किल है कि मोदी सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं!

 

 

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