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जनसत्ता संपादकीय : दुरुस्त आयद

आज गंगा की गिनती दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में होती है। इसलिए सहज ही यह सवाल उठता है कि जो हजारों करोड़ रुपए गंगा सफाई के नाम पर खर्च किए गए वे कहां गए?
Author नई दिल्ली | June 14, 2016 03:33 am
उमा भारती। (SCREENSHOT)

यह अच्छी बात है कि केंद्र ने गंगा से जुड़ी योजनाओं का कैग यानी नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक से आॅडिट कराने का निर्णय किया है। इस पहल की अहमियत अब तक के अनुभवों के मद््देनजर समझी जा सकती है। गंगा सफाई की पहली वृहद योजना 1985 में बनी थी। गंगा एक्शन प्लान के नाम से बनी उस योजना को तीस साल हो चुके हैं। पर उसका क्या हासिल रहा, यह गंगा के प्रदूषण-मुक्त होने के बजाय उसमें प्रदूषण बढ़ते जाने से जाहिर है।

आज गंगा की गिनती दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में होती है। इसलिए सहज ही यह सवाल उठता है कि जो हजारों करोड़ रुपए गंगा सफाई के नाम पर खर्च किए गए वे कहां गए? पर सिफर साबित होने में यह योजना अपवाद नहीं रही। दूसरी अनेक योजनाओं का भी ऐसा ही हश्र रहा है। सवाल है कि इतने भारी-भरकम खर्च की कोई जवाबदेही क्यों नहीं तय हुई? यूपीए सरकार के समय गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर गंगा व गंगा बेसिन की सफाई की नए सिरे से महत्त्वाकांक्षी योजना बनाई गई। पर यह सिरे नहीं चढ़ पाई। फिर, राजग सरकार ने नमामि गंगे नाम से धूम-धड़ाके से गंगा निर्मलीकरण की नई योजना शुरू की और जल संसाधन, नदी विकास व गंगा सरक्षण नाम से अलग मंत्रालय भी गठित कर दिया। इस मंत्रालय की मंत्री उमा भारती ने कहा है कि गंगा की सफाई के लिए सरकार अल्पकालिक व दीर्घकालिक, दोनों तरह की योजना बना कर आगे बढ़ रही है। एक तरफ नदी का न्यूनतम पारिस्थितिकी प्रवाह सुनिश्चित किया जाएगा और दूसरी तरफ इन योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इनका कैग से आॅडिट कराया जाएगा। उन्हें यह भी भरोसा दिलाना चाहिए कि कैग की रिपोर्टों के मद््देनजर शीघ्र कार्रवाई की जाएगी। अक्सर हम देखते हैं कि कैग की रिपोर्ट सदन में पेश तो कर दी जाती है, मगर उस पर न बहस होती है न सरकार कार्रवाई करने की जहमत उठाती है।

लेकिन कैग वित्तीय गड़बड़ियों की तरफ ही ध्यान खींच सकता है, योजना की दूसरी खामियां नहीं बता सकता। जबकि पर्यावरणविद मानते हैं कि गंगा को स्थायी रूप से प्रदूषण-मुक्त बनाने की एक प्रमुख शर्त गंगा के प्रवाह को अविरल बनाए रखने की है। टिहरी और दूसरे बड़े बांधों के चलते उसकी अविरलता को क्षति पहुंची है। पहले के बांधों के प्रभाव की समीक्षा किए बगैर, गंगा पर नई जल विद्युत परियोजनाएं धड़ल्ले से बनाई जाती रही हैं। अगर गंगा की अविलरता को बचाना है तो उसे सिर्फ संसाधन के तौर पर देखने के निरे व्यावसायिक आग्रह को छोड़ना होगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि गंगा की निर्मलता और अविरलता का तकाजा गंगा तक सीमित नहीं है; उसकी सहायक नदियों को भी प्रदूषण से बचाने का अभियान चलाना होगा। फिर, निर्मलीकरण का लक्ष्य नदी तट के नगरीय नियोजन से भी वास्ता रखता है। चमड़ा, रसायन, चीनी, शराब आदि बहुत सारे उद्योगों के अपशिष्ट और शहरी कचरा गिराए जाने की वजह से गंगा समेत तमाम नदियां दिनोंदिन और प्रदूषित होती गई हैं। नदियों के किनारे अतिक्रमण भी लगातार बढ़ता गया है। एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के चलते करखनिया कचरा और सीवर की गंदगी गिराए जाने के सिलसिले पर अंकुश लगना शुरू हुआ है, पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

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