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जनसत्ता संपादकीय : तालाबों की सुध

राज्य के राजस्व विभाग का दावा है कि 2012-13 के दौरान करीब पैंसठ हजार अवैध कब्जों को हटाया गया। पर जो तालाब अतिक्रमण या अवैध कब्जे से बच गए हैं उनकी भी हालत खस्ता है।
लातुर के लिए भेजी गई जलदूत ट्रेन। (Express Photo by Arul Horizon)

केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने भरोसा दिलाया है कि बुंदेलखंड में चंदेल नरेशों के समय बने तालाबों को ‘बहाल’ किया जाएगा, जो कि अभी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। उनके मुताबिक इन तालाबों को दुरुस्त करने के लिए केंद्र सरकार पहल कर रही है। अगर ऐसा है तो सूखे और पेयजल संकट से ग्रस्त बुंदेलखंड के लिए इससे अच्छी बात और क्या होगी। बुंदेलखंड शुष्क क्षेत्र है, गरमी के दिनों में यहां तापमान अड़तालीस डिग्री तक चले जाना आम बात है। इस क्षेत्र में पानी की कमी हमेशा रही है, पर नौवीं से चौदहवीं सदी के बीच चंदेल नरेशों के बनवाए तालाबों की वजह से यह कमी संकट का रूप नहीं लेती थी। बेमिसाल डिजाइन वाले ये तालाब आपस में भूमिगत रूप से इस तरह जुड़े थे कि एक तालाब में पानी भर जाने पर अगले तालाबों को भरे और इलाके के सारे तालाब भरने के बाद ही बारिश का बचा हुआ पानी किसी नदी में गिरे। ये तालाब वर्षाजल को सहेजने के नायाब तरीके के उदाहरण थे।

आज वर्षाजल संचयन की बात तो बहुत होती है, पर कम ही लोगों को इस बात का खयाल होगा कि विभिन्न अंचलों में स्थानीय समाजों ने एक समय इसकी कैसी-कैसी विधियां ईजाद और विकसित की थीं। उन विधियों को अपनाना तो दूर, उन्हें मटियामेट कर देने का सिलसिला लंबे समय से जारी है। शायद ही कोई राज्य हो, जहां तालाब अतिक्रमण तथा विकास की बलि न चढ़े हों। उन पर अवैध कब्जे की दास्तान हर जगह सुनने को मिलेगी, विकास के नाम पर उन्हें पाट कर कॉलोनियां बना देने की भी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद स्थिति सुधरी नहीं है। उत्तर प्रदेश में क्या हाल है, यह आरटीआइ के तहत हासिल हुई जानकारी से सामने आ चुका है। इससे पता चलता है कि नवंबर 2013 की खतौनी के मुताबिक प्रदेश में लगभग 8 लाख 75 हजार तालाब, झील, जलाशय और कुएं हैं। इनमें से एक लाख से ज्यादा जलस्रोत अतिक्रमण के शिकार हैं।

राज्य के राजस्व विभाग का दावा है कि 2012-13 के दौरान करीब पैंसठ हजार अवैध कब्जों को हटाया गया। पर जो तालाब अतिक्रमण या अवैध कब्जे से बच गए हैं उनकी भी हालत खस्ता है। उनकी देखरेख की कोई जरूरत महसूस नहीं की जाती, एकदम उनके किनारे तक गलियां-सड़कें और मकान बन गए हैं। यानी बचे-खुचे तालाबों को भी वर्षाजल को सहेजने की उनकी भूमिका से काट दिया गया है। यही अधिकतर नदियों के साथ भी हुआ। उन पर बड़े-बड़े बांध बना दिए जाने से उनकी अविरलता कायम न रह सकी। फिर, ऐन किनारे तक निर्माण-कार्य की छूट देते जाने से पुनर्भरण और जल संग्रहण की उनकी क्षमता घटती गई। नतीजतन जहां सामान्य दिनों में नदियों में पानी कम रहता है वहीं बरसात में जल्दी ही वे उफनने लगती हैं और बाढ़ ला देती हैं। उत्तराखंड और फिर कश्मीर की अपूर्व बाढ़ के पीछे एक प्रमुख कारण नदियों के साथ किया गया यह बर्ताव ही था। बुंदेलखंड के हालिया सूखे को लेकर केंद्र कितना संवेदनशील था, यह वहां वाटर ट्रेन के नाम पर खाली टैंकर भेजने से जाहिर हो गया। अब केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने तालाबों को सजीव बनाने की जरूरत महसूस की है। अच्छी बात है। पर पहले तालाबों से अतिक्रमण तो हटाया जाए।

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