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जनसत्ता संपादकीयः आजादी का दायरा

आखिरकार प्रधानमंत्री को चुप्पी तोड़नी पड़ी। उन्होंने दो दिन में दो बार कथित गोरक्षकों को हिंसा से बाज आने की चेतावनी दी और राज्यों को उनकी कारगुजारियों से सख्ती से निपटने को कहा।
Author नई दिल्ली | August 17, 2016 06:26 am
​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 70वें स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से राष्‍ट्र को संबोधित किया। (Source: Twitter)

उना कांड के विरोध में जब अमदाबाद में दलितों की रैली हुई थी, तभी लगने लगा था कि दलितों के रोष का यह इजहार एक आंदोलन की शक्ल भी ले सकता है। रैली में लिए गए फैसले के मुताबिक दलितों ने अमदाबाद से साढे तीन सौ किलोमीटर लंबा मार्च किया, जिसकी परिणति पंद्रह अगस्त को एक आमसभा में हुई। अलबत्ता पूर्व घोषित कार्यक्रम के मुताबिक इस मार्च यानी दलित अस्मिता यात्रा का समापन उना में नहीं हो सका, क्योंकि स्थानीय लोगों के एक हिस्से से टकराव का अंदेशा होने के चलते पुलिस ने वहां मार्च को पहुंचने नहीं दिया। लेकिन मार्च के समापन पर हुई सभा में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। दस दिन चले मार्च में दूसरे राज्यों के भी दलित कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शरीक हुए। जुलाई में उना में कथित गोरक्षकों ने कुछ दलितों की जो बर्बरतापूर्ण पिटाई की थी, उसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसके विरोध में गुजरात में तो दलित एकजुट होकर सड़कों पर उतरे ही, बाकी देश में भी विरोध की आवाज उठी।

आखिरकार प्रधानमंत्री को चुप्पी तोड़नी पड़ी। उन्होंने दो दिन में दो बार कथित गोरक्षकों को हिंसा से बाज आने की चेतावनी दी और राज्यों को उनकी कारगुजारियों से सख्ती से निपटने को कहा। पर प्रधानमंत्री के इस बयान से सब कुछ ठीक हो जाएगा, लगता नहीं। दरअसल, दलितों का असंतोष बहुत व्यापक है और इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। उना की घटना ने तो बस चिनगारी का काम किया है। दलितों पर अत्याचार की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं, पर वे अमूमन स्थानीय खबर बन कर रह जाती हैं। कई बार खबर भी नहीं बनती होंगी। लेकिन उना ने दूसरी भी घटनाओं की याद ताजा कर दी है। मसलन, गुजरात में सुरेंद्रनगर के थानगढ़ में 2012 में पुलिस की गोली से दो दलित मारे गए थे। पर मानवाधिकार हनन के इस मामले में आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। फिर, अनुसूचित जाति अत्याचार अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में सजा की दर बहुत कम रही है। पुलिस जांच के स्तर पर ही ज्यादातर मामलों को कमजोर कर देती है। पर्याप्त सबूत न होने की बिना पर बहुत सारे आरोपी छूट जाते हैं।

दलितों के साथ भेदभाव की घटनाएं समाज में तो रोजाना होती ही हैं, सरकारी महकमे और संस्थाएं भी इस विकृति से अछूते नहीं हैं। स्कूल में दलित विद्यार्थियों को अलग बैठाने के बहुतेरे मामले मिलेंगे। मिड-डे मील में दलित बच्चों के साथ होने वाले भेदभाव की खबरें आती ही रहती हैं। ये बच्चे कैसा मानस लेकर बड़े होंगे? क्या विडंबना है कि जिन शिक्षा संस्थाओं को सामाजिक रूपांतरण का माध्यम होना चाहिए, वहां भी समाज की एक बड़ी बुराई को पोषण ही मिलता है। समाज से तो दलितों को हमेशा शिकायत रही है, उनके सड़कों पर उतरने की वजह यह है कि उनकी सुरक्षा के लिए राज्य अपने कर्तव्य का पालन मुस्तैदी से नहीं कर रहा है।

कानून का अनुपालन सुनिश्चित करने वाले विभाग ही कई बार उनके साथउत्पीड़क का व्यवहार करते हैं। पुलिस हिरासत में यातना दिए जाने के मामलों को सामाजिक पृष्ठभूमि के हिसाब से खंगालेंगे तो यातना भुगतने वालों में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की तादाद सबसे ज्यादा मिलेगी। आरक्षण ने दलितों के सशक्तीकरण में एक हद तक योगदान जरूर किया है, पर इस मकसद के लिए और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। दलित अस्मिता यात्रा ने यह सवाल उठाया है कि देश तो आजाद है, पर क्या देश के सब लोग भी समान रूप से आजाद हैं?

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