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जनसत्ता संपादकीयः घुसपैठ की सीमा

जम्मू-कश्मीर में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद पैदा हुई उथल-पुथल और करीब पचास लोगों की मौत ने पहले ही ऐसी स्थिति बना दी है कि उससे निपटना भारत के लिए एक चुनौती है।
Author नई दिल्ली | August 17, 2016 06:20 am
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महज दो दिन पहले पाकिस्तान ने हिंसाग्रस्त कश्मीर में जरूरत के सामान भेजने का प्रस्ताव देकर खुद को इस रूप में पेश किया था, मानो वह समस्या से निपटने में भारत की मदद करना चाहता है। लेकिन अगले ही दिन भारत इधर स्वतंत्रता दिवस के समारोहों और उसके मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने में व्यस्त था, तो दूसरी ओर कश्मीर के बारामूला जिले के उरी सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिश हुई। गनीमत यह रही कि चौकस सेना के जवानों को घुसपैठियों की संदिग्ध गतिविधियों पर शक हुआ और उन्होंने सही वक्त पर उनकी इस कोशिश को नाकाम कर दिया। इस घटना में पांच आतंकी मारे गए। यह किसी से छिपा नहीं है कि कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ के पीछे कौन खड़ा होता है और इसमें किस तरह की मदद पहुंचाई जाती रही है। सवाल है कि आखिर ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देते हुए पाकिस्तान मदद की पेशकश कर किसे भ्रमित करना चाहता है! अब बहुत सारे देश इस बात को समझने लगे हैं कि कश्मीर में जिस तरह की समस्या बनी हुई है, उसमें पाकिस्तान की क्या भूमिका है। सीमा पार से घुसपैठ की कोशिश हो या फिर आतंकी गतिविधियां, ऐसे लगभग सभी मौकों पर शक का सिरा आखिर पाकिस्तान से ही जुड़ता है। यह अलग बात है कि भारत की ओर से इसके पुख्ता प्रमाण पेश करने के बावजूद पाकिस्तान उन्हें खारिज करने में तनिक देर नहीं करता।

जम्मू-कश्मीर में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद पैदा हुई उथल-पुथल और करीब पचास लोगों की मौत ने पहले ही ऐसी स्थिति बना दी है कि उससे निपटना भारत के लिए एक चुनौती है। ऐसे में घुसपैठ या आतंकवाद की घटना को अंजाम देकर क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है? इस तरह के वाकयों के बाद भारत जब कोई सख्ती बरतता है और उसमें कुछ आतंकवादी मारे जाते हैं तो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का राग अलापने लगता है। लेकिन वह न केवल यह छिपा ले जाता है कि इन घटनाओं में उसका क्या हाथ है, बल्कि इस पर चर्चा भी नहीं करना चाहता कि पाकिस्तान में मानवाधिकारों की क्या स्थिति है! करीब नौ महीने पहले सीमा सुरक्षा बल के पचासवें साल के समारोह के मौके पर ये तथ्य सामने आए थे कि पिछले साल आतंकवादियों ने बासठ बार घुसपैठ की कोशिश की थी। इसके अलावा सीमा पार से हर दूसरे-तीसरे दिन अकारण गोलीबारी होती रहती है। यह स्थिति तब भी बनी हुई है जब अक्सर द्विपक्षीय बातचीत में ये सवाल शिद््दत से उठाए जाते हैं और उसमें पाकिस्तान स्थिति में सुधार का भरोसा दिलाता है। पिछले महीने के आखिर में भारत के सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तानी रेंजर्स के बीच लाहौर में हुई बातचीत में पाकिस्तान से मादक पदार्थों की तस्करी पर शिकंजा कसने के लिए चौकसी बढ़ाने और सीमा पार से होने वाली घुसपैठ के साथ-साथ आतंकी गतिविधियों पर रोक लगाने को कहा गया। उस बैठक में दोनों तरफ से सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए लगातार कोशिशें करने पर सहमति बनी थी। लेकिन संघर्ष विराम के दिखावे के बीच अगर घुसपैठियों को मदद पहुंचाने की कवायद चलती रहे तो ऐसी सहमति का क्या मतलब रह जाता है!

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