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जनसत्ता संपादकीय : बृहस्पति के दरवाजे पर

भारतीय मानस के लिहाज से देखें तो सबसे बड़ा होने के नाते बृहस्पति को ग्रहों का ‘राजा’ माना जाता है और ज्योतिष विद्या के मुताबिक इससे कई ऐसे शुभ-अशुभ जुड़े हुए हैं, जिनका हमारे जीवन पर असर पड़ता है।
Author नई दिल्ली | July 7, 2016 00:47 am
भारत अभी तक 19 देशों के कुल 45 उपग्रहों को कक्षाओं में स्थापित कर चुका है। (PTI Photo)

अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा के मानवरहित यान जूनो के बृहस्पति की कक्षा में पहुंचने के साथ ही दुनिया के समूचे विज्ञान-जगत में खुशी का माहौल स्वाभाविक है। तमाम अनिश्चितताओं और आशंकाओं के बीच और कुछ तकनीकी बाधाओं का सामना करने के बावजूद पांच साल के सफर की यह कामयाबी केवल एक अंतरिक्ष यान के अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुंचने की कहानी नहीं है। इस तरह का हर अभियान सौरमंडल की उन गुत्थियों को खोलने में मददगार साबित हो रहा है, जिनके बारे में या तो मनुष्य अब तक अनजान रहा या फिर अपनी सीमाओं की वजह से उसने उन चीजों को पारलौकिक मान लिया।

भारतीय मानस के लिहाज से देखें तो सबसे बड़ा होने के नाते बृहस्पति को ग्रहों का ‘राजा’ माना जाता है और ज्योतिष विद्या के मुताबिक इससे कई ऐसे शुभ-अशुभ जुड़े हुए हैं, जिनका हमारे जीवन पर असर पड़ता है। लेकिन सच यह है कि बृहस्पति भी एक ऐसा ग्रह है, जो सौरमंडल में पृथ्वी की तरह मौजूद है। दुनिया की दूसरी ब्रह्मांडीय गतिविधियों के बारे में कल्पनाओं के आधार पर बनी धारणाओं के बरक्स इस ओर भी ध्यान दिलाने का काम कभी खगोल विज्ञान ने किया और अब उसी की उपलब्धियों के सहारे हम बृहस्पति को बेहद करीब से जानने के मुहाने पर खड़े हैं। अब 2.7 अरब किलोमीटर का सफर तय करके बृहस्पति की कक्षा में पहुंचे जूनो के नौ उपकरणों के जरिए वहां के गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र, वायुमंडल में पानी की मौजूदगी का पता लगाया जाएगा। सोलह सौ किलो भार का यह यान अगले लगभग बीस महानों तक इस ग्रह के सैंतीस चक्कर लगाएगा और यह जानने की कोशिश की जाएगी कि बृहस्पति का निर्माण कैसे हुआ था।

यों अंतरिक्ष और उसमें मौजूद ग्रहों के बारे में जानने-समझने के लिए अनेक प्रयोग किए गए हैं, लेकिन यह पहली बार है जब इस तरह एक यान बृहस्पति के चारों ओर घूमते हुए इसके आंतरिक भाग, रचना और चुंबकीय क्षेत्र के रहस्यों को सामने लाने की कोशिश करेगा। इसका महत्त्व केवल बृहस्पति तक सीमित नहीं है। चूंकि बृहस्पति का निर्माण संभवत: सूर्य के बाद सबसे पहले हुआ, इसलिए जूनो के जरिए इसका अध्ययन सौरमंडल के बाकी ग्रहों के जन्म, उनकी व्यवस्था और भूमिकाओं को समझने में मदद करेगा। किसी दौर में अंतरिक्ष की अनसुलझी गुत्थियों के बारे में कुछ पारलौकिक धारणाओं के हिसाब से ही उसकी व्याख्या भी होने लगी होगी।

लेकिन विज्ञान के खोजी स्वभाव ने जब अपनी तकनीकी उपलब्धियों से उन धारणाओं को यथार्थ की पड़ताल करनी शुरू की तो अब न सिर्फ धरती से लेकर अंतरिक्ष तक के विस्तार की परतें समझ में आने लगी हैं, बल्कि इससे मनुष्य के ज्ञान और उसकी क्षमता का भी अंदाजा सामने आ रहा है। नासा ने बृहस्पति के बारे में जानने के मकसद से वहां जूनो से पहले गैलीलियो नामक अंतरिक्ष यान भेजा था। लेकिन लंबे समय तक वहां रहने के बावजूद कई तकनीकी सीमाओं की वजह से कोई बड़े महत्त्व की जानकारी सामने नहीं आ सकी थी। इसके बावजूद गैलीलियो की अहमियत इस रूप में है कि उसी अनुभव के आधार पर जूनो को बेहतर क्षमता से लैस किया गया। अब देखना है कि बीस महीने बाद जूनो जब बृहस्पति ग्रह के वातावरण में समा कर खत्म होगा, उससे पहले वह दुनिया को इसकी भौतिक और रासायनिक संरचना के किस पहलू से रूबरू कराता है।

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