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मनमानी का प्रचार

चुनाव प्रचार को लेकर नियम-कायदे तय हैं, इनके उल्लंघन पर दंड का प्रावधान है, मगर राजनीतिक दल इसकी कम ही परवाह करते देखे जाते हैं। ऐसे में अगर कहीं कानूनों में कोई सूराख नजर आ जाए तो उसका फायदा उठाने से वे भला कब बाज आने वाले हैं। दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार […]
Author February 7, 2015 18:25 pm
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चुनाव प्रचार को लेकर नियम-कायदे तय हैं, इनके उल्लंघन पर दंड का प्रावधान है, मगर राजनीतिक दल इसकी कम ही परवाह करते देखे जाते हैं। ऐसे में अगर कहीं कानूनों में कोई सूराख नजर आ जाए तो उसका फायदा उठाने से वे भला कब बाज आने वाले हैं। दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार खत्म हो जाने के बाद अखबारों में छपे पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन इसका ताजा उदाहरण हैं। कायदे से चुनाव प्रचार की समय सीमा समाप्त हो जाने के बाद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों से अपने पक्ष में मतदान की अपील कर सकते हैं। किसी तरह के पोस्टर-बैनर आदि का प्रदर्शन नहीं कर सकते। मगर पिछले कुछ चुनावों से देखा जा रहा है कि राजनीतिक दल अखबारों में विज्ञापनों की भरमार लगा देते हैं। इस बार भी यही हुआ। भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के सभी प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर विज्ञापन देकर केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए दिल्ली विधानसभा के लिए अपने पक्ष में मतदान करने की अपील की। इस पर स्वाभाविक ही आम आदमी पार्टी ने निर्वाचन आयोग के समक्ष आपत्ति जताई। मगर निर्वाचन आयोग ने इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन मानने से इनकार कर दिया। जाहिर है, उसने नियम-कायदों का ध्यान रखते हुए ही इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मगर समझना मुश्किल है कि जब टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि पर चुनावी विज्ञापन प्रसारित करने पर रोक है, तो अखबारों में इसके लिए छूट क्यों होनी चाहिए? इन विज्ञापनों को उसी रूप में नहीं देखा जा सकता, जैसे राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता जनसंपर्क के दौरान पर्चे आदि बांटते फिरते हैं।

कुछ साल पहले तक मतदान केंद्रों के बाहर राजनीतिक दलों के लोग पोस्टर-बैनर के साथ बैठ कर मतदान करने आए लोगों को चुनाव निशान के बारे में बताते-समझाते, मतदान में उनकी मदद करते सहज देखे जाते थे। मगर इस पर कुछ राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई और निर्वाचन आयोग को खुद लगा कि इस तरह मतदान केंद्रों पर प्रचार करना उचित नहीं, इसलिए इस पर रोक लगा दी गई। अब मतदान केंद्रों के बाहर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता पहले जैसे सक्रिय नहीं दिखाई देते। इसका तोड़ पिछली बार हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान कुछ दलों ने निकाल लिया। ऐन मतदान वाले दिन दिल्ली के सभी अखबारों में पहले और आखिरी पन्ने पर पूरे पृष्ठ के विज्ञापन छपवाए गए। निर्वाचन आयोग की सख्ती की वजह से राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने प्रचार के लिए पर्चे, पोस्टर-बैनर आदि का इस्तेमाल तो नहीं किया, मगर वे जगह-जगह अखबार खोले बैठे देखे गए। तब भी इस तरह विज्ञापन प्रकाशित कराने को लेकर आपत्ति दर्ज की गई थी, पर वही तर्क रहा जो अब है, इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी। निर्वाचन आयोग अखबार के किस पन्ने पर विज्ञापन छपें, किस पर नहीं यह तो तय नहीं कर सकता, मगर इस तरह आचार संहिता का उल्लंघन होता नजर आए तो उसके लिए कायदा बनाने पर विचार जरूर कर सकता है। अखबारों के पहले पन्ने पर विज्ञापन छपवाने का मकसद छिपा नहीं है। एक तो इस तरह विज्ञापन की दृश्यता बढ़ जाती है और दूसरे, खबरों में अगर कुछ ऐसा है जो विज्ञापनदाता पार्टी के विरुद्ध है, वह ढंक जाता है। जब प्रचार खत्म होने के बाद दूसरे संचार माध्यमों पर विज्ञापन देने और मतदान वाले दिन मतदान केंद्रों के आसपास प्रचार पर रोक लगाई जा सकती है, तो उस दिन अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर विज्ञापन प्रकाशित करने की नई प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने से परहेज क्यों होना चाहिए।

 

 

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