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कृषि की फिक्र

योजना आयोग की जगह बने नीति आयोग की पिछले हफ्ते हुई पहली बैठक में आमंत्रित अर्थशास्त्रियों ने उचित ही कृषि क्षेत्र की बिगड़ती जा रही हालत की ओर प्रधानमंत्री का ध्यान खींचा। यह बात खासकर इसलिए मायने रखती है क्योंकि मोदी सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र को और गति देने का उत्साह तो दिखाया है और […]
Author February 9, 2015 16:30 pm

योजना आयोग की जगह बने नीति आयोग की पिछले हफ्ते हुई पहली बैठक में आमंत्रित अर्थशास्त्रियों ने उचित ही कृषि क्षेत्र की बिगड़ती जा रही हालत की ओर प्रधानमंत्री का ध्यान खींचा। यह बात खासकर इसलिए मायने रखती है क्योंकि मोदी सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र को और गति देने का उत्साह तो दिखाया है और मेक इन इंडिया नाम से नई विनिर्माण नीति घोषित की है, पर कृषि क्षेत्र के लिए अभी तक उसका कोई महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम सामने नहीं आया है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि शुक्रवार को हुई बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने जन धन योजना, स्वच्छ भारत अभियान और रसोई गैस सबसिडी को नकदी रूप देने जैसे कार्यक्रमों की तो चर्चा की, पर कृषि क्षेत्र के लिए अपनी सरकार की कोई खास पहल वे नहीं गिना सके। बैठक में शामिल अर्थशास्त्रियों ने कृषि से संबंधित दो अहम मुद््दे रखे। एक, उत्पादकता में कमी का, और दूसरा, ऊंची लागत का।

हमारे जैसे विशाल आबादी वाले देश में अल्प उत्पादकता, यानी प्रति एकड़ पैदावार अपेक्षित या तुलनात्मक रूप से कम होना दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रतिकूल स्थिति है। अगर लागत भी ऊंची हो, तो कम उत्पादकता दोहरी समस्या का रूप ले लेती है। उत्पादकों के रूप में जहां इसका खमियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है, वहीं खाद्य सुरक्षा के लिहाज से यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है, या होना चाहिए। हमारे कृषि क्षेत्र में अल्प उत्पादकता के अनेक कारण रहे हैं। खेती को बहुत पहले से मानसून का जुआ कहा जाता रहा है और काफी हद तक वह आज भी मानसून पर निर्भर है। तमाम योजनाओं के बावजूद करीब एक तिहाई कृषिभूमि ही सिंचाई-सुविधा के दायरे में आ सकी है। ऐसे में बारिश की कमी जैसे मौसमी कारक और भी मारक हो जाते हैं। कृषि अनुसंधान पर कम ध्यान और नई तकनीक और नई जानकारी तक किसानों की कम पहुंच भी अपर्याप्त उत्पादकता की वजह हो सकते हैं।

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में उत्पादकता में कमी छोटी जोत से भी ताल्लुक रखती है, और यह तर्क देकर वे कृषिभूमि पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर लोगों की संख्या घटाने की वकालत करते रहे हैं। लेकिन यह सवाल वे कभी नहीं उठाते कि जो लोग शहर में रहते हैं या जिनकी आजीविका के स्रोत दूसरे हैं, वे कृषिभूमि के मालिक न हों। बहरहाल, सबसे ज्यादा गौर करने की बात यह है कि कृषि उत्पादकता घटने का सबसे नया और निरंतर व्यापक होता कारण पर्यावरण-विनाश की प्रक्रिया से जुड़ा है। भूजल का भंडार छीजता जा रहा है, लिहाजा सिंचाई के स्रोत के रूप में भी उसकी क्षमता दिनोंदिन घटती जा रही है। दूसरे, रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बेतहाशा इस्तेमाल के चलते जमीन की उर्वरा-शक्ति घटती गई है। आज मिट््टी की सेहत सुधारना और भूजल का संरक्षण कृषि उत्पादकता का सबसे बड़ा तकाजा है। इसे पूरा किए बिना न तो पैदावार की समस्या सुलझाई जा सकेगी न खेती टिकाऊ हो सकेगी। आज कुछ लोग कृषि संकट का समाधान केवल बड़े पूंजीनिवेश के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि कॉरपोरेट जगत ही अनुबंध आधारित खेती के जरिए कृषि क्षेत्र का उद्धार कर सकता है। पर उत्पादकता की कमी की आड़ लेकर कृषि क्षेत्र को इस राह पर ले जाने की कोशिश हुई तो वह एक बड़ी त्रासदी ही साबित होगी।

 

 

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