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चीन का साथ

विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की चीन यात्रा एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वहां जाने से पहले की तैयारी यात्रा थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत बनाने के इरादे दोहराए गए। छह सूत्रीय प्रस्ताव पेश किए गए। चीनी विदेशमंत्री वांग यी से मुलाकात के बाद सुषमा स्वराज ने भरोसा […]
Author February 3, 2015 13:42 pm
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विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की चीन यात्रा एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वहां जाने से पहले की तैयारी यात्रा थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत बनाने के इरादे दोहराए गए। छह सूत्रीय प्रस्ताव पेश किए गए। चीनी विदेशमंत्री वांग यी से मुलाकात के बाद सुषमा स्वराज ने भरोसा दिलाया कि दोनों देश सीमा विवाद सुलझाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं। हालांकि सितंबर में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत यात्रा के समय भी व्यापार संबंधी कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे, उनमें से कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए नया रास्ता खोलने संबंधी करार पर काफी हद तक काम पूरा भी हो चुका है। मगर पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत यात्रा पर आए और परमाणु करार पर हस्ताक्षर कर गए तो चीन को लगने लगा कि भारत उसके बजाय अमेरिका से अधिक नजदीकी बनाने को लालायित है। इसे लेकर उसने कुछ टिप्पणियां भी की थीं। यह भी कहा कि वह पाकिस्तान से अपने रिश्ते कमजोर नहीं होने देगा। ऐसे में सुषमा स्वराज के वहां जाने से चीन की तल्खी कुछ कम करने में मदद मिली है। चीनी राष्ट्रपति ने भी सुषमा स्वराज के प्रति गरमजोशी दिखाई है, इसलिए इसे दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार का संकेत माना जाना चाहिए। मगर भारत का जनमानस केवल व्यापारिक रिश्तों में बेहतरी नहीं, चीन के विस्तारवादी रुख में बदलाव की अपेक्षा करता है। लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने बार-बार चीन को ललकारा कि वह अपना विस्तारवादी रवैया छोड़े। अपनी चीन यात्रा के दौरान वे यह बात किस तरह समझा पाते हैं, देखने की बात होगी।

नरेंद्र मोदी सरकार का सारा जोर फिलहाल विदेशी निवेश आकर्षित करने पर है। उसकी विदेश नीति भी उसी के इर्दगिर्द घूमती नजर आती है। वरना इसकी कोई वजह नहीं थी कि चीन को लेकर सीमा विवाद पर आक्रोश जाहिर करने वाले नरेंद्र मोदी का सुर चीनी प्रधानमंत्री शी चिनफिंग की यात्रा के वक्त बदला हुआ था। पहले ही भारत के बाजार में चीन ने अपने लिए काफी बड़ी जगह बना रखी है। दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार पचहत्तर अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, मगर इसमें और इजाफा करने के मकसद से औद्योगिक पार्क बनाने के लिए चीन की तरफ से बीस अरब डॉलर के निवेश का समझौता हुआ। जिस वक्त चीनी राष्ट्रपति भारत यात्रा पर थे, चीनी सैनिकों के भारतीय सीमा के काफी अंदर तक घुस आने की वजह से सीमा पर तनाव का माहौल था। मगर उसे दूर करने के लिए कोई रास्ता नहीं निकाला जा सका। यह पहला मौका नहीं था, जब चीन ने सीमा विवाद को बड़ी सहजता से किनारे कर दिया। व्यापारिक और रक्षा संबंधी समझौतों के लिए तो वह बांहें खोल कर भारत का स्वागत करता है, मगर जैसे ही सीमा विवाद की बात उठती है, वह उसे ऐतिहासिक भूल बता कर व्यावहारिक समाधान की दिशा में बढ़ने से कतराने लगता है। अपना सामरिक दबदबा भी बनाए रखने की कोशिश करता है। जबकि भारत के लिए आए दिन सीमा पर पैदा होने वाले तनाव से पार पाना और सुरक्षा की दृष्टि से इस समस्या का समाधान ज्यादा अहम है। नरेंद्र मोदी से इस मामले में दृढ़ निश्चय और व्यावहारिक रणनीति के साथ आगे बढ़ने की अपेक्षा की जाती है। अभी तक विदेश मामलों में उन्हीं का हस्तक्षेप अधिक नजर आता है, जबकि सुषमा स्वराज ज्यादा अनुभवी और कुशल नेता हैं। उन्हें विदेश संबंधों के मामले में कुछ फैसले करने की छूट मिले, तो बेहतर नतीजे सामने आ सकते हैं।

 

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