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खेल में तमाशा

क्रिकेट में कई बार दर्शक इस कदर जज्बाती हो जाते हैं कि उससे न सिर्फ खिलाड़ियों की मुश्किल बढ़ जाती है, बल्कि पूरे देश को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। ओड़िशा के कटक में टी-20 मैच के दौरान..
Author नई दिल्ली | October 7, 2015 01:54 am

क्रिकेट में कई बार दर्शक इस कदर जज्बाती हो जाते हैं कि उससे न सिर्फ खिलाड़ियों की मुश्किल बढ़ जाती है, बल्कि पूरे देश को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। ओड़िशा के कटक में टी-20 मैच के दौरान ऐसी ही स्थिति बन गई। वहां दक्षिण अफ्रीका की टीम के साथ भारतीय क्रिकेट टीम का मैच था। बल्लेबाजी करते हुए भारतीय टीम बानवे रन पर ही सिमट गई। इस तरह दक्षिण अफ्रीकी टीम को एक आसान लक्ष्य मिल गया, जिसे पाने के लिए वह बहुत तेजी से आगे बढ़ चली। इससे आहत भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों ने मैदान में पानी की बोतलें फेंक कर अपना रोष प्रकट किया। इसके चलते खेल को बीच में रोक देना पड़ा।

सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे माहौल में किस तरह भारतीय खिलाड़ियों को मानसिक दबाव में खेलना पड़ा होगा। हालांकि दक्षिण अफ्रीका की टीम भारतीय टीम के मुकाबले कमजोर नहीं है, जिसके हाथों पराजय को स्वीकार करना मुश्किल कहा जा सके। मगर पिछले कुछ सालों से जिस तरह क्रिकेट में खेल के बजाय उन्माद की भावना जगह बनाती गई है, उसमें हर समय खिलाड़ियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहता है। हालांकि दूसरे खेलों में भी दर्शक अपने देश की टीम से जीत की ही उम्मीद लगाए रहते हैं, मगर भारत में क्रिकेट से उसकी तुलना नहीं की जा सकती। क्रिकेट को लेकर भारत ही नहीं, पाकिस्तान और श्रीलंका में भी जुनून का माहौल रहता है। कोई खेल असाधारण रूप से लोकप्रिय हो, इसमें हर्ज नहीं, पर मैच ही न हो पाने की स्थिति पैदा हो जाए तो यह उस खेल के लिए भी घातक है। साथ ही, इससे अपने देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान होता है।

यह पहला मौका नहीं है, जब दर्शकों ने मैदान में बोतलें फेंक कर अपनी निराशा और गुस्से का इजहार किया। कोलकाता के ईडन गार्डन में विश्वकप मैच के दौरान भी यही स्थिति देखी गई थी, जब श्रीलंका के मुकाबले भारतीय टीम की हार निश्चित दिख रही थी। ऐसा भी कई बार हो चुका है कि जब किसी दूसरे देश में भारतीय टीम हारी और खिलाड़ी स्वदेश लौटे तो हवाई अड्डे पर जुटे क्रिकेट प्रेमियों ने उनका बाहर निकलना मुश्किल कर दिया। काफी जद्दोजहद के बाद सुरक्षाकर्मी उन्हें वहां से निकाल पाए। किसी खेल से लगाव रखना और यह उम्मीद करना कि अपने देश की टीम का प्रदर्शन बेहतर हो, अच्छी बात है, उससे खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलता है। मगर किसी भी सूरत में प्रतिद्वंद्वी टीम को जीतता हुआ नहीं देख सकते, यह रवैया खेल भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

टी-20 का खेल इसी मकसद से शुरू किया गया था कि कम समय में खिलाड़ियों को अपना कौशल प्रदर्शित करने और क्रिकेट प्रेमियों का मनोरंजन करने का अवसर प्रदान किया जाए। मगर इसका यह अर्थ नहीं कि दर्शक अपनी मर्यादा भूल जाएं। इस तरह नाहक जज्बाती होने से विदेशी टीमों में भारतीय दर्शकों के प्रति नकारात्मक धारणा बनती है। किसी मेजबान देश के दर्शकों से मेहमान टीमों के प्रति सौजन्यता की अपेक्षा की ही जानी चाहिए।

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