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सीमापार के कैदी

यों तो अपने देश के कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर भी भारत और पाकिस्तान की सरकारें संवेदनशील नहीं रही हैं, लेकिन कैदी सीमापार के हों तो उनकी परेशानियों का कोई अंत नहीं होता। पड़ोसी देश की जेलों में बंद लोगों को न कोई कानूनी मदद मिल पाती है न कैद की बाबत उनके परिजनों को […]
Author June 22, 2015 17:53 pm

यों तो अपने देश के कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर भी भारत और पाकिस्तान की सरकारें संवेदनशील नहीं रही हैं, लेकिन कैदी सीमापार के हों तो उनकी परेशानियों का कोई अंत नहीं होता। पड़ोसी देश की जेलों में बंद लोगों को न कोई कानूनी मदद मिल पाती है न कैद की बाबत उनके परिजनों को सूचना। दूतावास अक्सर उनकी सुध नहीं लेते। यह संभव है कि पकड़े गए लोगों में से कुछ पर संगीन अभियोग हों।

पर पारदर्शिता न बरते जाने और सही सूचनाओं के अभाव में यह जान पाना मुश्किल होता है कि वास्तव में कौन निर्दोष है और किसका अपराध कितना है। फिर, सीमापार के कैदियों में अच्छी-खासी तादाद मछुआरों की होती है, जो मछली पकड़ने के सिलसिले में जाने-अनजाने सीमा पार कर जाते हैं। उनका अपराध इतना बड़ा नहीं माना जा सकता कि वे बरसों जेल में सड़ते रहें। मगर लंबे समय से यही होता आ रहा है। अमूमन उनकी रिहाई का रास्ता तब खुलता है जब दोनों तरफ की सरकारों को सौहार्द का कूटनीतिक संदेश देने की जरूरत महसूस होती है।

इसी तर्ज पर पिछले हफ्ते भारत ने गुजरात की जेलों में बंद एक सौ पंद्रह पाकिस्तानी मछुआरों में से अट्ठासी को रिहा करने की घोषणा की। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भी सद्भावना दिखाते हुए कराची की जेल में बंद एक सौ तेरह भारतीय मछुआरों को रिहा करने का फैसला किया। दोनों पक्षों ने ये कदम ऐसे समय उठाए हैं जब हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा के दौरान पाकिस्तान को लेकर की गई टिप्पणियों और म्यांमा की सीमा में उग्रवादी शिविरों पर की गई सैन्य कार्रवाई के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वाकयुद्ध छिड़ गया था।

ऐसे में मछुआरों की रिहाई आपसी तनाव कम होने और संबंध सुधारने की इच्छा का संकेत मानी जा सकती है। यह भी गौरतलब है कि पिछले हफ्ते के शुरू में मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन कर रमजान की बधाई देते हुए मछुआरों की रिहाई की बाबत उन्हें भारत की पहल से अवगत कराया, तो साथ में यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण और दोस्ताना रिश्ते की जरूरत है। इस दिशा में निकट भविष्य में क्या कदम उठाए जाएंगे, यह फिलहाल साफ नहीं है।

बहरहाल, सीमापार के कैदियों के साथ दोनों तरफ बुरा सलूक होता रहा है। कई कैदी सजा की मियाद पूरी हो जाने के बाद भी रिहा नहीं हो पाते। कइयों के लिए जेल यातनाघर साबित होता है। इससे भी बुरे उदाहरण हैं। सरबजीत सिंह के साथ दो साल पहले लाहौर की कोट लखपत जेल में जो हुआ उस पर भारत में गुस्से का उबाल आ गया था। तेईस साल से कैद रहे सरबजीत की जिंदगी जेल में उस पर हुए हमले की भेंट चढ़ गई। इसकी प्रतिक्रिया में कुछ ही दिन बाद जम्मू की कोट भलवल जेल में एक पाकिस्तानी कैदी मार दिया गया। ऐसी घटनाओं को लेकर कुछ समय के लिए ‘राष्ट्रवादी’ उबाल आ जाता है। मगर समस्या की तह में जाने की कोशिश कभी नहीं की जाती। भारत और श्रीलंका के बीच भी मछुआरों का मामला जब-तब उठता रहा है।

सवाल यह है कि मछुआरों को अचानक रिहा करने की उदारता तभी क्यों दिखाई जाती है जब सद्भावना का संदेश देना होता है। मछुआरों को कूटनीति का मोहरा या जरिया बनाने के बजाय सीमापार के कैदियों की बाबत एक ठोस आचार संहिता बनाई जानी चाहिए। भारत ने एक समय इस मामले में न्यायिक आयोग बनाने का प्रस्ताव रखा था, पर उस दिशा में हुआ कुछ नहीं। यह बेहद अफसोस की बात है कि शांति प्रक्रिया या विश्वास बहाली के एजेंडे में सीमापार के कैदियों के सवाल को कभी प्राथमिकता नहीं दी गई।

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