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संपादकीय: सहयोग के रास्ते

म्यांमा का राष्ट्रपति पद संभालने के बाद तिन क्यॉव की यह पहली विदेश यात्रा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात हुई।
Author August 31, 2016 06:26 am
मोदी ने म्यांमार नेता सू ची से मुलाकात की

दशकों से सैन्य शासन के कारण पड़ोसी होने के बावजूद म्यांमा के साथ भारत के संबंध इस शक्ल में परवान नहीं चढ़ पाए थे, जिसकी अपेक्षा दो लोकतांत्रिक देशों से की जाती है। लेकिन अब म्यांमा के साथ भारत के संबंधों के एक नया आयाम लेने की संभावना बनी है। कई नए मोर्चों पर सहयोग के रास्ते खुले हैं। आंग सांग सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की नई सरकार के साथ पहली शीर्ष-स्तरीय बैठक में आंतरिक सुरक्षा और वैश्विक आतंकवाद के मसले पर भारत के साथ सहयोग की बातचीत को इसी संभावना की एक कड़ी के तौर पर देखा जा सकता है। म्यांमा का राष्ट्रपति पद संभालने के बाद तिन क्यॉव की यह पहली विदेश यात्रा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात हुई। फिलहाल आतंकवाद की समस्या भारत के साथ-साथ म्यांमा के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।

इसलिए स्वाभाविक ही दोनों पक्षों ने माना है कि चूंकि एक दूसरे के सुरक्षा और सामरिक हित करीबी तौर पर जुड़े हुए हैं, इसलिए दोनों देशों में आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ मिल कर काम करने की जरूरत है। गौरतलब है कि उग्रवाद प्रभावित नगालैंड और मणिपुर सहित पूर्वोत्तर के कई राज्यों से भारत और म्यांमा की सीमा लगभग साढ़े सोलह सौ किलोमीटर तक साझा है। उस समूचे इलाके में उग्रवादी गतिविधियों में लिप्त संगठनों के ठिकाने म्यांमा में होने की बात भारत अक्सर उठाता रहा है। लेकिन म्यांमा में सैन्य शासन के दौरान सहयोग न मिल पाने की वजह से इस सवाल की अब तक अनदेखी होती रही। हालांकि हाल ही में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की म्यांमा यात्रा के दौरान वहां के नेतृत्व ने भरोसा दिलाया था कि वे भारत के खिलाफ किसी भी गतिविधि के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगे। म्यांमा के लिए यह इसलिए भी जरूरी है कि भारत उसके लिए एक मित्र देश है जो वहां के लोगों के लिए खड़ा रहा है।

सहयोग की दिशा में बढ़े इस कदम का असर दोनों के दूसरे क्षेत्रों में भी पड़ना लाजिमी है। यह इससे भी जाहिर है कि संपर्क, औषधि और अक्षय ऊर्जा के अलावा कृषि, बैंकिंग और बिजली सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए चार समझौते हुए। एक ठोस योजना व कार्यक्रम के तहत दोनों देशों के आपसी रिश्तों को और भरोसेमंद बनाना इसलिए भी जरूरी है कि पिछले कुछ समय से चीन कई बड़ी परियोजनाओं में भारी निवेश कर म्यांमा में अपनी मौजूदगी बढ़ाता रहा है। भारतीय सीमा के संवेदनशील क्षेत्रों में चीन किस तरह की गतिविधियों को अंजाम देता रहा है, यह छिपा नहीं है। यानी म्यांमा में चीन की भूमिका का बढ़ना भारत के लिए भविष्य में चिंताजनक हालात पैदा कर सकता है। अब भारत और म्यांमा के बीच सहयोग के नए अध्याय की शुरुआत होने से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि आपसी हितों पर साझेदारी की नई-नई संभावनाएं खुलेंगी। म्यांमा के पास प्राकृतिक गैस का विपुल भंडार है और विशाल मात्रा में खनिज भी। अगर म्यांमा से इस क्षेत्र में व्यापार बढ़े, तो भारत उस गैस पाइपलाइन परियोजना के आकार न ले पाने की क्षतिपूर्ति कर सकता है जो ईरान से गैस लाने के लिए बनी थी। और भी अच्छा होगा कि म्यांमा से दोस्ती कारोबारी साझेदारी तक सीमित न रहे, सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़े।

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