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जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल का तीन दिन के लिए भारत आना ऐसे वक्त हुआ जब वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्ती का शिकार है। इसलिए स्वाभाविक ही मर्केल की इस यात्रा के पीछे..
Author नई दिल्ली | October 7, 2015 01:55 am

जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल का तीन दिन के लिए भारत आना ऐसे वक्त हुआ जब वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्ती का शिकार है। इसलिए स्वाभाविक ही मर्केल की इस यात्रा के पीछे द्विपक्षीय रिश्तों को और मजबूत करने के साथ ही उनके देश का एक व्यापारिक मकसद भी दिखता है। वे भारत में जर्मनी के लिए कारोबारी अवसर बढ़ाना चाहती हैं। दूसरी ओर, भारत को भी जर्मनी से व्यापारिक संबंध बढ़ाना काफी उपयोगी दिखता है। जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी और दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था है। जर्मनी और भारत के बीच सालाना व्यापार फिलहाल करीब सोलह अरब यूरो का है, पर इसमें इजाफे की अपार संभावनाएं हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एंजेला मर्केल तथा दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत के बाद जिन अठारह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए उनमें से ज्यादातर आपसी व्यापार और निवेश में बढ़ोतरी से ही ताल्लुक रखते हैं। इन समझौतों में व्यापार और निवेश के अलावा ऊर्जा, कृषि और आंतरिक सुरक्षा जैसे विषय भी शामिल हैं। द्विपक्षीय संबंधों में इस तरह के करार होना आम बात है। इस अवसर पर जो खास बात हुई है, वह यह कि भारत ने एक त्वरित प्रणाली के लिए सहमति दे दी, ताकि जर्मन कंपनियों के प्रस्तावों पर तेजी से विचार और निर्णय हो सके। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में जर्मनी से हुआ करार है। जर्मनी ने भारत में ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए एक-एक अरब यूरो लगाने की पेशकश की है। जर्मनी की तरफ से यह प्रस्ताव भारत के लिए वक्त की जरूरत है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण निकाय यूएनएफसीसीसी को पिछले दिनों सौंपी अपनी कार्य-योजना में 2005 के मुकाबले अपना कार्बन उत्सर्जन 2030 तक तैंतीस से पैंतीस फीसद घटाने का लक्ष्य घोषित किया है। लिहाजा, जर्मनी की पेशकश उसके लिए बहुत मायने रखती है। जापान के फुकुशिमा हादसे के बाद जर्मनी ने अपने कई एटमी बिजलीघर बंद कर दिए। उसका जोर ऊर्जा के अन्य स्रोतों और हरित तकनीक पर है, और इसमें उसे दक्षता भी हासिल है। यही नहीं, जर्मनी में पर्यावरण आंदोलन भी और देशों के मुकाबले कहीं अधिक असरकारक रहा है। यूरोप का एक नेतृत्वकारी देश होने के कारण कूटनीतिक लिहाज से भी जर्मनी से नजदीकी बढ़ना भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के दावेदारों में जर्मनी भी है और जी-4 की एक बैठक हाल ही में न्यूयार्क में हो चुकी है। एंजेला मर्केल अपनी इस यात्रा को लेकर जहां उत्साहित दिखीं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने भी काफी दिलचस्पी दिखाई। केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा की पढ़ाई को लेकर विवाद मोदी सरकार आने के बाद ही उठा था। मर्केल की यात्रा का एक नतीजा यह भी हुआ कि वह विवाद सुलझा लिया गया। अब केंद्रीय विद्यालयों में अतिरिक्त विदेशी भाषा के तौर पर जर्मन पढ़ाई जाएगी, वहीं जर्मनी में आधुनिक भारतीय भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की जाएगी। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जर्मनी की अग्रगामिता से भारत लाभ उठाना चाहता है, तो जर्मनी भी आइटी क्षेत्र में भारत की प्रगति से प्रभावित है, जो कि मर्केल के भारत की साइबर राजधानी बंगलुरु जाने से भी जाहिर है। मर्केल की भारत यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में एक अहम मुकाम है।

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