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कठघरे में पुलिस

नाबालिग लड़की ‘गुड़िया’ से बलात्कार और हत्या के मामले में आया ताजा मोड़फिर अचानक खबर दी गई कि आधी रात को उनके बीच किसी बात पर आपस में लड़ाई हुई और मुख्य आरोपी ने सूरज की हत्या कर दी।
Author August 31, 2017 05:04 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Source: Express Archives)

पिछले महीने हिमाचल प्रदेश के कोटखाई में एक नाबालिग लड़की ‘गुड़िया’ से बलात्कार और हत्या के मामले में आया ताजा मोड़ हैरान करने वाला है। हालांकि इस घटना के बाद लोगों के बीच व्यापक पैमाने पर फैले आक्रोश के बाद गिरफ्तार आरोपियों में से एक की हिरासत में हत्या के बाद ही ये सवाल उठे थे कि पुलिस पूरे मसले को दबाने की साजिश कर रही है। लेकिन तब लोगों को शायद यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उस साजिश में निचले स्तर से लेकर शीर्ष स्तर के अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं। अब इस मामले में सीबीआई ने आइजी एस जहूर जैदी और ठियोग के डीएसपी मनोज जोशी सहित आठ पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया है। इन पर आरोप है कि गुड़िया से बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में गिरफ्तार लोगों में से एक नेपाली व्यक्ति सूरज की हत्या को पुलिसकर्मियों ने ही अंजाम दिया था। विडंबना यह है कि इस मामले की जांच के लिए जो एसआइटी गठित की गई थी, उसके प्रमुख खुद आइजी थे और उन्होंने न केवल सच्चाई को छिपाने में अहम भूमिका निभाई, बल्कि हत्या का आरोप एक अन्य मुख्य आरोपी पर थोप दिया गया। जाहिर है, इसका मकसद सीधे-सीधे जांच की दिशा को भ्रमित करना था ताकि असली आरोपियों को बचाया जा सके।

गौरतलब है कि नाबालिग लड़की ‘गुड़िया’ से बलात्कार और हत्या के मामले में आया ताजा मोड़फिर अचानक खबर दी गई कि आधी रात को उनके बीच किसी बात पर आपस में लड़ाई हुई और मुख्य आरोपी ने सूरज की हत्या कर दी। तब भी हिरासत में हत्या की बात पर विश्वास करना मुश्किल था। आम लोगों के बीच उभरे इस शक के अलावा वहां के एक सेवानिवृत्त डीजीपी ने भी आशंका जताई थी कि इस हत्या का असर सीबीआइ जांच पर पड़ सकता है, क्योंकि मृतक आरोपी शायद पुलिस को गुड़िया के असल हत्यारों के बारे में सब बताने के लिए तैयार हो गया था। जाहिर है, मुख्य सूत्र की मौत के बाद सीबीआइ को नए सिरे से अपराध की कड़ियों को जोड़ना था। हैरानी की बात यह है कि जहां एक मासूम से बलात्कार और उसकी हत्या के बाद पुलिस को अपराधियों को सजा दिलाने के लिए सब कुछ करना चाहिए था, वहीं वह उन्हें बचाने के खेल में शामिल हो गई।

इसका एक मतलब यह भी है कि अगर इस मामले की जांच सीबीआइ को नहीं सौंपी गई होती तो शायद यह पहलू सामने नहीं आ पाता। अब लंबी पूछताछ के बाद अगर पुलिस महकमे से जुड़े लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं तो निश्चित रूप से सीबीआइ के पास इसका पुख्ता आधार होगा। अब देखना यह है कि आगे जांच की प्रक्रिया में और क्या निकल कर आता है और ‘गुड़िया’ के अपराधियों को सजा कब मिल पाती है! इससे यह भी साफ हुआ है कि किसी मामले की तह तक पहुंच कर सुलझाने और दोषियों को सजा दिलाने की ड्यूटी करने के बजाय उसे दबाने में खुद पुलिस भी किस तरह की साजिशों में शामिल हो सकती है। यह बेवजह नहीं है कि बलात्कार के दर्ज मामलों में भी सजा की दर बेहद कम है और यह स्थिति महिलाओं के खिलाफ तमाम अपराधों के बढ़ते जाने का एक बड़ा कारण है। सवाल है कि जब रक्षक की ड्यूटी पर तैनात पुलिस की भूमिका ही संदिग्ध की हो जाए तो महिलाएं या सामान्य नागरिक किससे उम्मीद करें!

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