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संपादकीय: आलोचना का हक

राजद्रोह कानून की बाबत सुप्रीम कोर्ट ने उचित ही जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप व्यवस्था दी है।
Author नई दिल्ली | September 7, 2016 06:01 am
(प्रतीकात्मक फोटो)

राजद्रोह कानून की बाबत सुप्रीम कोर्ट ने उचित ही जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह साफ किया है कि अगर कोई व्यक्ति सरकार की कड़ी आलोचना भी करता है तो वह न मानहानि के दायरे में आता है और न ही राजद्रोह के। इस विषय में उसे राजद्रोह कानून की दोबारा व्याख्या करने की कोई जरूरत नहीं है। केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ 1962 में सब कुछ पहले ही स्पष्ट कर चुका है। सर्वोच्च अदालत ने मातहत अदालत के जजों और पुलिस अधिकारियों को याद दिलाया है कि राजद्रोह के मामले में वे संविधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले को न भूलें। खंडपीठ ने यह टिप्पणी कॉमन कॉज नामक एक गैरसरकारी संगठन की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सोमवार को की।

पिछले कुछ दिनों से जिस तरह का माहौल देश में बना हुआ है, उसमें सर्वोच्च अदालत की ताजा टिप्पणी की प्रासंगिकता समझी जा सकती है। यह माना जाता है कि कोई राजनेता किसी के प्रति प्रतिशोध भाव रख भी सकता है और सत्ता में आने के बाद अपने विरोधियों के विरुद्ध किसी कानून को हथियार की तरह इस्तेमाल कर भी सकता है, लेकिन पुलिस और जज उससे निरपेक्ष रहेंगे। खंडपीठ इस संदर्भ में कोई नया दिशा-निर्देश जारी करने को रजामंद नहीं हुआ, जैसा कि याचिका की मांग थी। लेकिन पहले के फैसले की याद दिला कर अदालत ने एक बार फिर साफ कर दिया कि उसका रुख क्या है। अदालत ने कहा कि जज हों या पुलिस महानिदेशक, संविधान पीठ के फैसले की अनदेखी नहीं कर सकते। फिर भी, उन्हें एक बार और यह याद दिलाया जा रहा है कि वे केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामले में 1962 में पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के फैसले को ध्यान में रखें। इस फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (ए) (राजद्रोह) को लेकर स्पष्ट किया जा चुका है। इसके मुताबिक किसी भी नागरिक को यह अधिकार है कि वह सरकार के बारे में मनचाहे तरीके से आलोचना या टिप्पणी कर सकता है। कोई भी व्यक्ति जब तक किसी विधिसम्मत सरकार के खिलाफ लोगों को हिंसा के लिए नहीं भड़काता या इरादतन लोक-अव्यवस्था नहीं फैलाता तब तक वह राजद्रोह का दोषी नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी हों या दंडाधिकारी, वे संविधान पीठ के फैसले को मानने को बाध्य हैं।

याचिका में कहा गया था कि राजद्रोह एक गंभीर अपराध है और आजकल सरकारें ‘डर पैदा करने और असहमति को दबाने’ के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रनेताओं, लेखकों, अभिनेताओं, कवियों, कार्टूनिस्टों वगैरह को अपना निशाना बना रही हैं। याचिका ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के हवाले से बताया था कि 2014 में राजद्रोह के छियालीस मामले दाखिल हुए, जिनमें अट्ठावन व्यक्तियों की गिरफ्तारी की गई, मगर सजा सिर्फ एक मामले में हुई। प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय, सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, छात्रनेता कन्हैया कुमार, तमिलनाडु के लोकगायक एस कोवन, उत्तर प्रदेश में पढ़ रहे 67 कश्मीरी छात्रों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ। याचिका में कहा गया है कि सरकारों ने ये कार्रवाइयां सिर्फ डराने के लिए कीं। लाजिम है कि सर्वोच्च अदालत के रुख को देखते हुए सरकारें भी शायद अब यह सोचने पर मजबूर हों कि ‘सबक सिखाने’ के लिए वे आए दिन जो राजद्रोह कानून का दुरुपयोग करती हैं, वह निशाना उलट भी सकता है।

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