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वर्दी की मर्यादा

राजनीति में छुटभैये राजनीतिकों का बड़े नेताओं के चरण छूना जैसे चलन बन चुका है। मगर पुलिस महकमा भी इस छूत से बच नहीं सका है। पश्चिम बंगाल के योजना और विकास मंत्री रछपाल सिंह के निजी सुरक्षाकर्मी का उनके जूते के फीते बांधना इसी का एक ताजा उदाहरण है। मंत्री महोदय रामकिंकर बैज की […]
Author May 27, 2015 10:37 am

राजनीति में छुटभैये राजनीतिकों का बड़े नेताओं के चरण छूना जैसे चलन बन चुका है। मगर पुलिस महकमा भी इस छूत से बच नहीं सका है। पश्चिम बंगाल के योजना और विकास मंत्री रछपाल सिंह के निजी सुरक्षाकर्मी का उनके जूते के फीते बांधना इसी का एक ताजा उदाहरण है। मंत्री महोदय रामकिंकर बैज की प्रतिमा पर फूल-माला चढ़ाने गए थे। अपने जूते बाहर उतार दिए। लौटते वक्त जब वे जूते पहनने लगे तो उनके निजी सुरक्षाकर्मी ने लपक कर जूते पहनाए और फीते बांधे। रछपाल सिंह ने उसे ऐसा करने से नहीं रोका। पुलिस महकमे ने शायद ऐसी संस्कृति विकसित करने का प्रयास नहीं किया है कि जब कोई सुरक्षाकर्मी वर्दी में तैनात हो तो वह इस तरह किसी के पैर छूने, सलामी देने या जूते पहनाने जैसा कृत्य न करे। पिछले दिनों सेनाध्यक्ष ने कहा था कि जब सैनिक वर्दी में तैनात हों तो उन्हें रास्ता चलते किसी भी अधिकारी को सलामी देने की जरूरत नहीं।

आमतौर पर देखा जाता है कि सुरक्षा के मद्देनजर तैनात सिपाही किसी मंत्री या पुलिस अधिकारी की गाड़ी गुजरते वक्त सहज भाव से सलामी में अपने हाथ उठा देते हैं। ऐसा इसलिए भी है कि राजनेता और पुलिस अधिकारी खुद ऐसा सम्मान पाने में गर्व का अनुभव करते हैं। पिछले साल जम्मू-कश्मीर काडर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अपने सहायक सिपाही से जूते बंधवाते हुए तस्वीरें सामने आई थीं। पश्चिम बंगाल के मंत्री रछपाल सिंह खुद पुलिस अधिकारी रह चुके हैं। उन्हें सिपाही की वर्दी की मर्यादा का भान होना चाहिए था। पर उन्होंने इसके विपरीत आचरण किया, जिसे सामंती ही कहा जाएगा।

इस तरह का यह कोई अकेला वाकया नहीं है। जूते पहनाने, जूते साफ करने, घरेलू काम करने जैसे तरीकों से राजनीतिक रसूख वाले लोगों के प्रति स्वामिभक्ति प्रदर्शित करने के पीछे कई बार नौकरी में तरक्की और कमाई वाली जगहों पर तैनाती पाने की मंशा रहती होगी। पर कई बार यह ऐसी प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा होता है जिसमें यह सोचा ही नहीं जाता कि मातहत काम करने वालों की भी अपनी गरिमा हो सकती है। जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें सबके सामने जूते पहनाए। इसकी तस्वीरें छपीं और तब इस पर काफी विवाद उठा था। पर मनुवाद को कोसने वाली मायावती को इस प्रसंग में कुछ भी गलत नहीं लगा था। सिपाहियों से घरेलू काम लेने के न जाने कितने किस्से होंगे। राजनेता अपनी खुशामद करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों से घिरे रहना पसंद करते हैं, इसके बदले वे उन्हें उपकृत भी करते हैं। उनकी अनेक मनमानियों को नजरअंदाज कर देते हैं। इसलिए बहुत सारे प्रशासनिक अधिकारी, पुलिसकर्मी उनके कृपापात्र बने रहने की कोशिश करते हैं।

जिस तरह सेनाध्यक्ष ने अपने सिपाहियों को वर्दी के सम्मान और कर्तव्य पालन की सीख दी, वैसा पुलिस के किसी आला अधिकारी ने कहने का साहस नहीं दिखाया तो इसका बड़ा कारण यह होगा कि पुलिस महकमा सत्तापक्ष के निर्देशों का पालन करने और उसकी मंशा के अनुरूप चलने का अभ्यस्त हो चुका है। तबादलों और रास न आने वाली ड्यूटी में लगा दिए जाने के भय से वे जी-हुजूरी करते रहते हैं। सुरक्षाकर्मी की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उसकी सेवा-टहल करना या अपनी वर्दी की मर्यादा के विरुद्ध आचरण करना। पुलिस को बेजा राजनीतिक दखलंदाजी से बचाने के लिए सोराबजी समिति ने जो सिफारिशें की थीं, ताजा प्रकरण से उनकी प्रासंगिकता एक बार फिर रेखांकित हुई है।

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