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भ्रष्टाचार के तहखाने

यह अच्छी बात है कि ओइसीडी यानी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन ने काले धन से संबंधित सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान का ढांचा तैयार किया है। भारत सहित चालीस देशों ने इसे जल्द से जल्द अपनाने की सहमति दी है। इसका लाभ यह होगा कि अगर किसी देश के करदाता का खाता अन्य देश में […]
Author February 17, 2015 11:44 am
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यह अच्छी बात है कि ओइसीडी यानी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन ने काले धन से संबंधित सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान का ढांचा तैयार किया है। भारत सहित चालीस देशों ने इसे जल्द से जल्द अपनाने की सहमति दी है। इसका लाभ यह होगा कि अगर किसी देश के करदाता का खाता अन्य देश में है तो संबंधित बैंक वहां के वित्तीय अधिकारियों को इसकी जानकारी देंगे। फिर वहां की सरकार उस जानकारी को करदाता के देश की सरकार को फौरन मुहैया करा देगी। इससे काले धन का पता लगाना, उस पर नजर रखना, कर-चोरी और धोखाधड़ी से निपटना पहले से आसान हो जाएगा। लेकिन डर यह है कि चोरी-छिपे पैसा जमा करने वाले ऐसे देशों या बैंकों का रुख कर सकते हैं जो इस सहमति के बाहर होंगे।

दूसरे, इस ढांचे के तहत भारत को अपने करदाताओं के विदेशी खातों की जानकारी पाने के लिए 2018 तक इंतजार करना होगा। आशंका यह है कि संदिग्ध लोग तब तक डाल-डाल पात-पात की और तरकीबें निकाल सकते हैं। इसलिए काले धन की जांच में तेजी लाई जानी चाहिए। इस मामले में पिछली सरकार का रवैया ढुलमुल था, इस सरकार का भी वैसा ही है। अब तक जिन गुप्त विदेशी खातों के बारे में पता चला है उसका श्रेय देश की किसी सरकार को नहीं है। ये खुलासे दूसरे लोगों ने किए।

कुछ साल पहले एक स्विस बैंक के एक कर्मचारी ने वहां के विदेशी खातों की बाबत जानकारी फ्रांस सरकार को दी थी, या बेच दी थी। उसमें भारतीय खाताधारकों से जुड़ी जानकारी फ्रांस ने भारत सरकार को दी। हाल में पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने एचएसबीसी की स्विस शाखा के सैकड़ों खातों का खुलासा किया। इनमें भारतीय नाम भी थे। लिहाजा, हमारे सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर गठित एसआइटी के पास बाहर जमा काले धन की खोजबीन के लिए पहले से ज्यादा पुख्ता सूचनाएं हैं। फिर, सबसेअहम बात यह है कि काला धन देश में ही पैदा होता है और उसका बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही रहता है। अगर सरकार में इच्छाशक्ति हो तो अधिकतर मामलों में वह किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते या कर-संधि की मोहताज नहीं है। ये संधियां और समझौते पूरक ही हो सकते हैं, मुख्य भूमिका देश के भीतर सरकार की अपनी कार्रवाई की ही हो सकती है। सरकार विदेशी खाते से संबंधित जानकारी देना अनिवार्य बना सकती है। फिर, कर-चोरी से इनके संबंध का पता लगाना और अघोषित विदेशी खातों को गैर-कानूनी ठहराना आसान हो जाएगा। बहुत-सा काला धन चोरी-छिपे शेयर बाजार में पहुंचता है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि पहचान छिपा कर निवेश करने की छूट बंद कर दी जाए। काले धन का एक रास्ता ‘मारीशस रूट’ यानी फर्जी कंपनियों के जरिए एफडीआइ बता कर होने वाला निवेश भी है।

वित्त मंत्रालय की नजर से ये हथकंडे छिपे नहीं हैं। फिर, कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? काले धन के असर से जहां तमाम चीजों की महंगाई बढ़ती है, वहीं बड़े पैमाने पर राजस्व की क्षति होती है, जिससे कल्याणकारी योजनाओं को चलाना मुश्किल होता जाता है। काले धन का प्रवाह बने रहने से बेईमानी की प्रवृत्ति और भ्रष्टाचार को लगातार बढ़ावा मिलता रहता है। तस्करी जैसे संगठित अपराधों के गिरोहों की बन आती है। यह सब जानते हुए भी काले धन को लेकर अब तक जुबानी जमा-खर्च ही होता रहा है, तो इसका कारण शायद यही है कि हमारी राजनीति को भी काफी हद तक काले धन ने ग्रस लिया है। चौंधिया देने वाले चुनावी प्रचार-खर्च और कुछ मौकों पर जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त का पैसा कहां से आता है? लिहाजा, एक बुनियादी तकाजा यह है कि चुनावी चंदे को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए और उम्मीदवारों की तरह पार्टियों के भी चुनावी खर्च की सीमा तय हो।

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