ताज़ा खबर
 

बीजी वर्गीज

आज पत्रकारिता की दुनिया में संजीदगी, संतुलन और निर्भीकता जैसे गुण विरल मालूम पड़ते हैं। लेकिन बीजी वर्गीज इन्हीं मूल्यों से बने थे। पेशेवर कामयाबी हासिल करने वाले ढेर नाम गिनाए जा सकते हैं, पर उन्होंने जो सम्मान अर्जित किया वह बहुत कम लोगों को मिल पाता है। अकादमिक उद्यम ने भी उन्हें औरों से […]
Author January 1, 2015 16:40 pm

आज पत्रकारिता की दुनिया में संजीदगी, संतुलन और निर्भीकता जैसे गुण विरल मालूम पड़ते हैं। लेकिन बीजी वर्गीज इन्हीं मूल्यों से बने थे। पेशेवर कामयाबी हासिल करने वाले ढेर नाम गिनाए जा सकते हैं, पर उन्होंने जो सम्मान अर्जित किया वह बहुत कम लोगों को मिल पाता है। अकादमिक उद्यम ने भी उन्हें औरों से विशिष्ट बनाया। पत्रकार आमतौर पर रोजमर्रा की देश-दुनिया की घटनाओं तक सिमटे रह जाते हैं। लेकिन वर्गीज के जानने-सोचने और लिखने का दायरा काफी बड़ा था; उनकी रुचियां विविध थीं। वे समकालीन घटनाओं और मुद््दों पर तो लिखते ही रहते थे, उन्होंने कई ऐसी पुस्तकें भी लिखीं, जो गहरी समझ, शोध और अध्यवसाय का परिणाम हैं। पत्रकारीय मूल्यों के वाहक और अध्येता वर्गीज ने पत्रकारों की कई पाढ़ियों का मार्गदर्शन किया, कइयों के प्रेरणा-स्रोत रहे। वर्ष 1969 से 1975 तक वे ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक रहे। फिर 1982 से 1986 तक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के। इसके बाद वे ‘सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च’ से जुड़ गए। वर्गीज के साथ जिन लोगों ने काम किया, उनके लिए वही समय सीखने का सबसे अच्छा अवसर साबित हुआ। अपने सहकर्मियों की त्रुटियां बताने में वर्गीज कभी संकोच नहीं करते थे, पर हर बार इसका मकसद काम को और बेहतर करना ही होता था।

वे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सलाहकार भी रहे। मगर देश पर इमरजेंसी थोपने का फैसला उन्हें नागवार गुजरा और वे इंदिरा गांधी के आलोचक हो गए। दरअसल, अभिव्यक्ति की आजादी समेत नागरिक अधिकारों को लेकर उनकी निष्ठा अटूट थी। जब वे सत्ता के नजदीक रहे तब भी उनकी यह पक्षधरता कमजोर नहीं पड़ी। गुजरात दंगों की बाबत एडिटर्स गिल्ट की तथ्य संकलन समिति में वे भी शामिल थे। गिल्ड की बैठकों में वही सबसे ज्यादा मुखर रहते थे। वे मेगसायसाय पुररस्कार से सम्मानित हुए। परस्कार समिति ने भी रेखांकित किया कि उनमें सार्वजनिक जिम्मेदारी का अहसास प्रबल था। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिनमें इंडियाज नार्थ-ईस्ट रिसर्जेंट, वाटर्स आॅफ होप, रिओरियेंटिंग इंडिया: रेज, रिकांसिलिएशन ऐंड सिक्युरिटी, फर्स्ट ड्राफ्ट: विटनेस टु द मेकिंग आॅफ इंडिया प्रमुख हैं। इसके अलावा उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रामनाथ गोयनका की जीवनी भी लिखी। उनका आखिरी महत्त्वपूर्ण अकादमिक काम शायद डाक सेवा और डाक टिकटों के इतिहास का अध्ययन था। पूर्वोत्तर पर गहरा अध्ययन करने और किताब लिखने के साथ ही उन्होंने देश के इस क्षेत्र के प्रति केंद्र की रूढ़ मानसिकता बदलने की भी कोशिश की। इसे भी नागरिक अधिकारों के प्रति उनके सरोकारों से जोड़ कर देखा जा सकता है।

सत्तासी साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले वर्गीज ने 1949 में अपना कॅरियर शुरू किया और आजादी के बाद के भारत की हर चीज पर निगाह रखी। आजादी से अब तक के भारत को उन्होंने अध्ययन और अनुभव, दोनों तरह से जाना और उस पर काफी लिखा भी। उर्वर लेखक वर्गीज, आखिरी कुछ दिनों की बीमारी को छोड़ कर, अंत तक सक्रिय रहे। पत्रकारों पर जब भी हमले की घटना हुई, उन्होंने विरोध में आवाज उठाई। दूसरी तरफ वे पत्रकारों को उनकी जिम्मेवारियों का अहसास कराने और पत्रकारीय मूल्यों की याद दिलाने में भी कभी पीछे नहीं रहे। आज मीडिया में बाजार का दबाव काफी बढ़ गया है, और यह रुझान प्रबल हो चुका है कि जो आसानी से बिके वही परोसा जाए। इसके बरक्स बीजी वर्गीज पत्रकारिता की सधी हुई और संतुलित आवाज थे। उनका निधन पत्रकारिता की एक बड़ी मेधा का अवसान तो है ही, एक नैतिक रिक्तता भी छोड़ गया है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. Rekha Parmar
    Jan 2, 2015 at 12:57 pm
    Visit Website for Latest Gujarati News :www.vishwagujarat/gu/
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग