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दिल्ली सरकार के एक मंत्री को पद से हटाए जाने की खबर ने दो वजहों से देश का ध्यान खींचा। एक तो इसलिए कि आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली है और भ्रष्टाचार मिटाना इसका...
Author नई दिल्ली | October 12, 2015 17:30 pm

दिल्ली सरकार के एक मंत्री को पद से हटाए जाने की खबर ने दो वजहों से देश का ध्यान खींचा। एक तो इसलिए कि आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली है और भ्रष्टाचार मिटाना इसका सबसे खास वादा रहा है। ऐसे में पार्टी की सरकार के एक मंत्री पर रिश्वत मांगने का आरोप चौंकाने वाली बात है। पूरे देश का ध्यान इस तरफ जाने का दूसरा कारण यह रहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने, तथ्य सामने आने पर, बिना हीलाहवाली किए आसिम मोहम्मद खान को बर्खास्त कर दिया। जबकि दूसरी पार्टियां अपने दागियों का बचाव करती रहती हैं। लिहाजा, केजरीवाल का यह फैसला आज के राजनीतिक परिदृश्य में एक अपवाद जैसा दिखता है।

आसिम मोहम्मद खान आप सरकार में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री थे। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने एक व्यक्ति से भवन का निर्माण जारी रखने देने के लिए छह लाख रुपए रिश्वत मांगी थी। शिकायतकर्ता ने इसका आॅडियो सबूत भी मुख्यमंत्री को दिया था। इसके बाद भी केजरीवाल अगर खान को मंत्री-पद से न हटाते तो उनकी किरकिरी तय थी। हो सकता है ऑडियो-क्लिप किसी और राजनीतिक पार्टी या किसी चैनल के पास पहुंच जाता, और तब यह सवाल उठता कि सबूत मुहैया कराए जाने पर भी केजरीवाल ने संबंधित मंत्री के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की।

यह सवाल उठने की गुंजाइश पैदा हो, इससे पहले ही केजरीवाल ने खान को हटा दिया, और इस तरह एक मुद्दा विपक्ष के हाथ लगते-लगते रह गया। यही नहीं, केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस को यह चुनौती भी दे डाली कि ये पार्टियां भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अपने लोगों को कुर्सी से हटा कर दिखाएं। इसमें दो राय नहीं कि केजरीवाल का यह साहसिक कदम है। उन्होंने खान पर लगे आरोप की जानकारी खुद मीडिया को दी, प्रथम दृष्टया सबूत आते ही तत्काल कार्रवाई की, यह बहाना नहीं किया कि पहले जांच पूरी हो जाने दें।

इसी मौके पर केजरीवाल ने एक बार फिर दोहराया कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त न करने की नीति पर चल रही है। अच्छी बात है। पर इसी के साथ कुछ सवाल भी उठते हैं। एक यह कि इस तरह की तत्परता उन्होंने तब क्यों नहीं दिखाई जब जीतेंद्र सिंह तोमर की फर्जी डिग्री का मामला उजागर हुआ था। पार्टी और मुख्यमंत्री, जब तक संभव हुआ, तोमर का बचाव करते रहे। जब यह संभव नहीं रहा, तभी तोमर को पद से हटाया गया। फिर पार्टी ने कहा कि वह धोखा खा गई। घरेलू हिंसा के मामले में फंसे सोमनाथ भारती का भी केजरीवाल बचाव करते रहे, और जब उन्होंने अपना रुख बदला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

दूसरा सवाल यह उठता है कि ऐसी पार्टी, जो हर तरह से जांच-परख कर उम्मीदवार तय करने का दावा करती आई है, उसने ऐसे लोगों को कैसे टिकट दे दिया जो शर्मिंदगी का सबब बन गए। पार्टी को दुबारा सत्ता में आए महज आठ महीने हुए हैं, और उसके सात मंत्रियों में से एक को फर्जी डिग्री के कारण और एक को रिश्वत मांगने के कारण हटाना पड़ गया। पार्टी के कई विधायकों के खिलाफ भी गंभीर शिकायतें हैं। खान की बर्खास्तगी के जरिए केजरीवाल ने जो संदेश देना चाहा है वह स्वागत-योग्य है, पर सवाल है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली पार्टी ने खुद को पाक-साफ रखने की जो प्रक्रिया सोची थी उसका क्या हुआ?

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  1. B
    Bhagat
    Oct 12, 2015 at 11:42 pm
    आपकी जर्नलिज्म बिक गयी है>>>डेल्ही में प्लांटेड गवर्नमेंट मीडिया और बहार की एजेंसी ने बनाया है. बस इकॉनमी ब्लास्ट करने के लिए दस साल ही तो पीछे करना है काम हो जायेगा वेस्टर्न कंट्री का ७० की प्लोइटिक्स को २१ वी सताब्दी में आपलोगों ने ही तो उठा कर दिया है..दम है तो पूछो केजरीवाल से विदेश में कौन सी पढाई की है.... ८ महीने में दिखा दिया वो वहां क्यों बैठना चाहते थे..मीडिया की विश्वनीयता येलोग मिलकर ही खत्म करेंगे...और आप देखते रह जाओगे...चौथे स्तम्भ की ताकत को स्पॉट जर्नलिज्म बनाकर छोड़ेगा
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  2. M
    manisha
    Oct 14, 2015 at 2:54 pm
    अरविंद केजरीवाल ने अपने मंत्री आसिम खान को पद से हटाकर बेहद साहसी काम को अंजाम दिया इसमें कोई दो राय नहीं साथ ही उन्होंने उन तमाम लोगों को संदेश भी दिया जो अपने दागी मं.ियों का बचाव करते हे। लेकिन उन्हें इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उन्होंने गलत मं.ियों का चुनाव किया हम या आप कभी भी जानबूझाकर गलत लोगों का चुनाव नहीं करते कम से कम उनहोंने समाज में एक अच्छा संदेश तो दिया कि हम भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे बाकी तो इतना करने का दिखावा भी नहीं कर पाते
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  3. R
    Rabindra Nath Roy
    Oct 15, 2015 at 10:43 pm
    केजरिवाल भ्रस्टाचार के खिलाफ हैं, इस बात पर अब शक है. जनलोकपाल बिल बिधान सभा मे पारित करने जब बिल रखने वख्र्त कानग्रेस ने साथ नही दिया तब इन्हॉने कहा था, जब भरस्टाचार से निपटने का हथियार जनळोकपाल बिधेयक पास करने की स्थिति मे आआपा नही है तो कुर्सी पे रहने का कॉई मतलब नही होता और ४९ दिन के बाद इसी केजरिवाल ने मुख्य मन्त्री पद से ईस्तफा दे दिया और इस का इतना शॉर हुआ के भारत मे ये बेमिशाल था . और अब सात महीने हुये बम्पर मेजॉरिटी की ये सरकार अबतक वो बिल पारित तो दुर उसकी बात भी नही करती.
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  4. S
    suresh k
    Oct 14, 2015 at 9:17 pm
    केजरीवाल जी बधाई के पत्र है , वह महाभारत के अभिमन्यू की तरह बदमाशो से घ्हिरे हुए है , देहली में बहुत अच्छा काम कर रहे है ,
    Reply
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