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नशे की जद

गोवा में बड़ी तादाद में स्कूली बच्चों के मादक पदार्थों की लत का शिकार होने की खबर गहरी चिंता का विषय है। ऐसा लगता है कि न इससे सरकार को कोई मतलब है, न समाज को इस बात..
Author नई दिल्ली | September 8, 2015 16:21 pm

गोवा में बड़ी तादाद में स्कूली बच्चों के मादक पदार्थों की लत का शिकार होने की खबर गहरी चिंता का विषय है। ऐसा लगता है कि न इससे सरकार को कोई मतलब है, न समाज को इस बात की फिक्र है कि इस स्थिति से भविष्य की कैसी तस्वीर बन रही है। अगर किसी समाज में शराब या दूसरे मादक पदार्थों के सेवन को लेकर कोई सीमा या हिचक नहीं है, तो इस माहौल का असर कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों पर पड़ना तय है। आज गोवा में मादक पदार्थों की लत के शिकार लोगों में बड़ी संख्या किशोरों की है। जब शासन और समाज किसी व्यसन और उसके असर को लेकर लापरवाह रहता है, तो उसके ऐसे नतीजे अस्वाभाविक नहीं हैं।

नशे के कारोबार के खिलाफ कोई ठोस नीति न होने और सरकार की उदासीनता की वजह से हालत यह होती गई है कि न सिर्फ वयस्क लोगों के बीच मादक पदार्थों का चलन आम होता गया, बल्कि कॉलेज जाने वाले और खासकर बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले युवक-युवतियां भी इसकी जद में आने लगे हैं। लगभग पांच महीने पहले दक्षिण गोवा के कर्तोरिम गांव में मादक पदार्थों के अत्यधिक सेवन के चलते जब दो युवकों की जान चली गई, तो इस घटना ने सबका ध्यान खींचा और युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर चिंता पैदा हुई।

यह समझना मुश्किल नहीं है कि बच्चे अपने आसपास की जिन गतिविधियों और माहौल में पलते-बढ़ते हैं, उनकी जीवन-शैली में भी वे चीजें घुलती-मिलती रहती हैं। इसलिए अगर मादक पदार्थों का सेवन किसी समाज का आम हिस्सा होगा, तो उसका विस्तार बच्चों तक भी हो जाएगा। एक पहलू यह भी है कि आज बहुत सारे अभिभावक अपनी व्यस्तताओं में इस कदर गुम होते हैं कि बच्चों के लिए वक्त निकालना उन्हें जरूरी नहीं लगता। यह उपेक्षा भी बच्चों के नशे की गिरफ्त में जाने का कारण बनती है। लेकिन यह समस्या केवल सामाजिक पैमाने पर जागरूकता के अभाव की नहीं है। ज्यादा राजस्व मिलने का तर्क देकर शराब के कारोबार और बिक्री को सरकारों ने किस तरह बढ़ावा दिया है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। नशा किसी शौक से शुरू होकर एक प्रवृत्ति में तब्दील हो जाता है। ऐसी एक चीज की लत पड़ने पर व्यक्ति के दूसरे मादक पदार्थों का भी आदी होने की संभावना बढ़ जाती है।

विडंबना यह है कि जब भी शराब, सिगरेट या दूसरे मादक पदार्थों के सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति के समाज पर घातक असर का सवाल उठाया जाता है, तो कुछ लोग इसे निजी मामला बता कर नैतिक पहरेदारी से जोड़ कर पेश करने लगते हैं। सवाल है कि जब कम उम्र के बच्चों के बीच भी यह प्रवृत्ति गंभीर होती जा रही है, तो इसे कैसे निजी मामले के तौर पर देखा जाए! निजी मामले की दलील देने वाला कौन व्यक्ति यह चाहेगा कि उसके बच्चे पढ़ाई-लिखाई करने, एक संवेदनशील नागरिक बनने और भविष्य बेहतर बनाने के बजाय मादक पदार्थों के नशे में डूब जाएं!

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