December 07, 2016

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हिलेरी क्लिंटन के रूप में अमेरिका को पहली महिला राष्ट्रपति मिलने की मजबूत उम्मीदें फिलहाल टूट गर्इं।

Author November 10, 2016 03:41 am
डोनाल्ड ट्रंप (File Photo)

राजनीतिक प्रेक्षकों के तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल कर चुके हैं। इस तरह हिलेरी क्लिंटन के रूप में अमेरिका को पहली महिला राष्ट्रपति मिलने की मजबूत उम्मीदें फिलहाल टूट गर्इं। दरअसल, चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत से ही ट्रंप के रवैए और अमेरिकी जनता के रुख के बारे में जिस तरह खबरें आ रही थीं, उसमें उनकी जीत की संभावना न के बराबर थी। मगर अब वे विश्व के सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले देश का शीर्ष चेहरा हैं। इस नाते न केवल अमेरिका, बल्कि दुनिया भर में उनसे जो उम्मीदें और आशंकाएं होंगी, वे इसी कसौटी पर देखे जाएंगे। दरअसल, पिछले कुछ महीनों से ट्रंप जितना

अमेरिकी नीतियों पर अपने विचार के लिए जाने जा रहे थे, उससे ज्यादा वे कुछ ऐसे बयानों के चलते लगातार विवादों में रहे, जिन्हें काफी आपत्तिजनक माना गया। खासकर अश्वेतों, महिलाओं, प्रवासी भारतीयों और मुसलिम समुदाय के प्रति उनके प्रतिगामी बयानों ने उन्हें ऐसे कठघरे में खड़ा कर दिया था, जिनके चलते उन्हें अमेरिका का प्रतिनिधि चेहरा मानने में बहुत सारे लोगों को दिक्कत हुई। प्रचार अभियान के दौरान भी ट्रंप के बर्ताव ने उनके प्रति नकारात्मक धारणा को मजबूत किया। यहां तक कि जब अंतिम दौर में हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच सार्वजनिक बहस हुई तो उन्हें कमजोर पड़ते देखा गया।

मगर आखिरकार नतीजे उनके पक्ष में गए, तो कुछ खास समुदायों के प्रति दुराग्रह रखने के बावजूद अब उन पर अमेरिका के तमाम लोगों के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी है। इसलिए हो सकता है कि अपने लिए समर्थन जुटाने के मकसद से दिए गए उनके बयानों के निशाने पर जो लोग और समूह रहे, उनके प्रति व्यवहार में उनका वही रवैया न हो। अमेरिका में महिलाओं के गर्भपात को गैरकानूनी बनाने से लेकर अश्वेतों के बारे में जिस तरह की राय उन्होंने जाहिर की थी, अगर वे नीतिगत स्तर पर भी उसी ओर आगे बढ़े तो इसे निश्चित रूप से अमेरिका के वक्त से पीछे जाने के तौर पर देखा जाएगा। लेकिन कई बार कुछ बयान चुनावों में समर्थन हासिल करने के लिए दिए जाते हैं। इसलिए अलग-अलग सामाजिक समूहों के प्रति उनके नीतिगत रुख का इंतजार करना होगा।
वैश्विक पैमाने पर उन्होंने बराक ओबामा के शासन की विदेश नीति पर जो सवाल उठाए और आइएसआइएस के गुप्त समर्थन तक के आरोप लगाए थे, अगर वे उसका कोई आधार पाते होंगे तो यह देखने की बात होगी कि कार्यभार संभालने के बाद इस मसले पर वे रुख क्या अपनाते हैं।

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खासकर यह कि कभी अमेरिका के बरक्स दूसरे ध्रुव पर रहे रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने ट्रंप की जीत पर जो सकारात्मक राय जाहिर की है और चुनावों से पहले चीन में ट्रंप को अपने लिए अनुकूल उम्मीदवार होने की खबरें आई थीं, उसके मद्देनजर वे किन नीतियों पर आगे बढ़ते हैं। जहां तक भारत का सवाल है, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका और भारत के बीच संबंधों में जमी बर्फ थोड़ी पिघलती दिखी है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिका में नौकरियों और प्रवासियों के बारे में अगर वे अपने बयानों को ही नीतियों का आधार बनाते हैं तो इसका बड़ा खमियाजा शायद भारतीयों को उठाना पड़े। अगर ऐसा होता है तो भारत और अमेरिका के संबंधों में इसका क्या असर पड़ता है, यह भी देखने की बात होगी।

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First Published on November 10, 2016 3:37 am

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