ताज़ा खबर
 

संपादकीय: बेजा रुख

यह बेहद अफसोस की बात है कि तीन तलाक के मसले पर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड आज भी अपने पुराने रुख पर कायम है।
Author नई दिल्ली | September 5, 2016 04:16 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

यह बेहद अफसोस की बात है कि तीन तलाक के मसले पर मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड आज भी अपने पुराने रुख पर कायम है। सर्वोच्च अदालत में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में बोर्ड ने कहा है कि ‘तीन तलाक’ की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता; पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिखा जा सकता; मुसलिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके, बल्कि यह कुरान से लिया गया है और यह इस्लाम धर्म से संबंधित धार्मिक मुद््दा है। गौर करें तो ऐसे ही तर्क कई और मामलों में भी दिए जाते रहे हैं। मसलन, हाजी अली की दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर चली आती रही पाबंदी के बचाव में। कहा जाता रहा कि यह पाबंदी इस्लाम के उसूलों पर आधारित है और इसमें दखल देना धार्मिक मामलों में दखल देना माना जाएगा। लेकिन मुंबई हाइकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया, जैसा कि उसने शनि शिंगणापुर के मामले में भी किया था, और पाबंदी हटाने का आदेश देकर दरगाह में मुसलिम महिलाओं के प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया।

इस प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाने की पहल ‘भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन’ ने की थी। यही समूह मुसलिम पसर्नल लॉ में सुधार के लिए भी मुहिम चलाता रहा है। इन्हींं में से एक महिला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में कुछ महीनों से सुनवाई चल रही है। मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड का यह कहना सही है कि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में पहले फैसला सुना चुका है। पर जैसा कि कोर्ट ने कुछ समय पहले कहा था कि पहले के निर्णय में कुछ कमियां हो सकती हैं। उचित यह होगा कि पहले के फैसले को देखते हुए इस मामले को जजों के अधिक बड़े पीठ या संविधान पीठ को सौंपा जाए। लेकिन इस तर्क में दम नहीं है कि मुसलिम पर्सनल लॉ अपरिवर्तनीय है।

कई इस्लामी या मुसलिम बहुल देशों ने निजी कानूनों में फेरबदल किए हैं और सबके सब के सब प्रावधान एकदम एक जैसे नहीं हैं। इसलिए इस्लाम की दुहाई देना या आड़ लेना एक दुराग्रह ही है। कुरान का सहारा लेकर भी तीनतलाक प्रथा का बचाव नहीं किया जाना चाहिए। दरअसल, यह मामला पवित्र कुरान का नहीं, बल्कि उसकी अलग-अलग व्याख्याओं का है। जो महिलाएं इस प्रथा के खिलाफ आंदोलन चला रही हैं वे भी इस्लाम और कुरान में आस्था रखती हैं, पर वे कहती हैं कि इस्लाम या कुरान ने उनके अधिकार छीनने या कम करने को नहीं कहा है। यह बात अपनी जगह सही है कि हमारा संविधान विभिन्न समुदायों को धार्मिक-सांस्कृतिक स्वायत्तता देता है। पर संविधान ने इसकी सीमा भी तय की है; यह स्वायत्तता देश के सभी नागरिकों को संविधान से मिले मौलिक अधिकारों के आड़े नहीं आनी चाहिए। इसी बिना पर मुंबई हाइकोर्ट ने पहले शनि शिंगणापुर के मामले में और फिर हाजी अली दरगाह के मामले में धार्मिक स्वायत्तता के तर्क को नहीं माना। मुसलिम पर्सनल लॉ में संशोधन से न तो कुरान की पवित्रता पर कोई आंच आएगी, न इस्लाम का कोई नुकसान होगा। हां, केवल पुरुष को विवेक-संपन्न मानने के एकतरफा वर्चस्ववाद को जरूर धक्का लगेगा। लेकिन मुसलिम पसर्नल लॉ को लेकर अब खुद मुसलिम समाज के भीतर पुनर्विचार का रुझान दिखने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह दिनोंदिन और प्रभावी होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग