March 24, 2017

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संपादकीय: श्रेय की सियासत

पर्रीकर के बयान में दो बातें खास हैं। एक तो यह कि लक्षित हमले का सबसे ज्यादा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है। दूसरे, नियंत्रण रेखा के पार ऐसा लक्षित हमला पहले कभी नहीं हुआ था।

Author October 14, 2016 04:49 am
आगरा में कार्यक्रम के दौरान रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर। (PTI File Photo)

उड़ी की आतंकी घटना के बाद सेना द्वारा नियंत्रण रेखा पार कर किए गए लक्षित हमले यानी सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर कुछ दिनों से चल रही सियासी खींचतान रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर के ताजा बयान से एक बार फिर तेज हो गई। बेशक यह दुर्भाग्यपूर्ण है। बुधवार को आए पर्रीकर के बयान में दो बातें खास हैं। एक तो यह कि लक्षित हमले का सबसे ज्यादा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है। दूसरे, नियंत्रण रेखा के पार ऐसा लक्षित हमला पहले कभी नहीं हुआ था। इस बयान में, सर्जिकल स्ट्राइक का सियासी फायदा उठाने की कोशिश साफ नजर आती है।निश्चय ही 28-29 सितंबर की रात में सेना ने जो कार्रवाई की, वह प्रधानमंत्री की अनुमति के बगैर नहीं की होगी। यह भी सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके पीछे प्रधानमंत्री की न सिर्फ अनुमति बल्कि पहल भी रही होगी। इसीलिए जब कार्रवाई की खबर जाहिर हुई, तो सेना के साथ-साथ सरकार को भी सब ओर से सराहना मिली।

उड़ी की घटना के बाद प्रधानमंत्री को जहां, उनके पुराने बयानों के बरक्स, लगातार आलोचना के स्वर सुनने को मिल रहे थे, वहीं सर्जिकल स्ट्राइक के बाद वे चतुर्दिक प्रशंसा के पात्र बन गए। उन्हें विपक्ष की तरफ से भी प्रशंसा ही मिली। लेकिन लगता है भाजपा को इतने से संतोष नहीं हुआ। पार्टी के कुछ लोगों ने ऐसे पोस्टर-होर्डिंग लगाने शुरू कर दिए, जिनमें सर्जिकल स्ट्राइक के लिए सेना के साथ-साथ प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, गृहमंत्री का गुणगान था। यह सब उन राज्यों में ज्यादा दिखा जहां विधानसभा चुनाव होने हैं। लिहाजा, सैन्य कार्रवाई से सियासी फायदा उठाने की मंशा साफ नजर आती है। क्या पता, चुनाव और नजदीक आने पर यह कवायद और ज्यादा दिखे। पिछले दिनों खुद प्रधानमंत्री ने ऐसा न करने की सलाह पार्टी नेताओं को दी थी। पर पार्टी के स्थानीय नेताओं की कौन कहे, स्वयं रक्षामंत्री उस सलाह पर अमल करना जरूरी नहीं समझते।

सेना पूरे देश की होती है। इसलिए उसकी किसी उपलब्धि से दलगत लाभ उठाने की कोशिश हरगिज नहीं होनी चाहिए। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सर्जिकल स्ट्राइक भारतीय सेना के पराक्रम का एकमात्र उदाहरण नहीं है। इससे पहले 1948, 1965 और 1971 से लेकर करगिल तक हमारी सेना के नाम शौर्य और पराक्रम के बड़े-बड़े अध्याय दर्ज हैं। यह दिलचस्प है कि रक्षामंत्री पिछले महीने हुई सर्जिकल स्ट्राइक का तो श्रेय मोदी को देने में कोई कसर नहीं रखना चाहते, मगर साथ ही उनकी कोशिश यह भी है कि पूर्व में हुई ऐसी कार्रवाई का श्रेय तत्कालीन सरकार को न मिले; पर्रीकर पहले कभी ऐसी कार्रवाई होने से ही इनकार करते हैं, जबकि ‘आॅपरेशन जिंजर’ का खुलासा तब के एक आला फौजी अफसर के हवाले से ही हुआ है। यह अफसोसनाक है कि सर्जिकल स्ट्राइक पर जैसी सर्वसम्मत प्रतिक्रिया शुरू में दिखी थी, अब वैसा आलम नहीं है।

कुछ दिनों से सत्तापक्ष ने राजनीतिक लाभ उठाने के चक्कर में मर्यादा लांघी है, तो विपक्ष ने मोदी को मिलते श्रेय को रोकने की कोशिश में। सर्जिकल स्ट्राइक की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए गए हैं, जबकि पाकिस्तान के इनकार के अलावा और कोई ऐसी बात फिलहाल सामने नहीं आई है जो सेना के दावे पर शक पैदा करती हो। बहरहाल, सीमापार आतंकवाद के खिलाफ सेना के लक्षित हमले को लेकर राजनीतिक नफा-नुकसान का खेल बंद होना चाहिए। यह आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय सहमति के लिहाज से भी जरूरी है और सेना की छवि के लिए भी।

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First Published on October 14, 2016 4:49 am

  1. A
    ANKIT MISHRA
    Oct 14, 2016 at 9:39 am
    जनसत्ता वालो झूट मत फैलाओ किसी फौजजि ने कुछ नहीं कहा है this इस प्लान स्टोरी रियल स्टोरी तो यस है की किस जीनगर आपरेशन के बाद आपरेशन को अंजाम देने वालो सैनिकों को उप ने सजा दी थी और जेल मैं डाला था
    Reply

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