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भरोसे के कातिल

ब्रिटेन से भारत आया चौवन वर्षीय ब्रिटिश नागरिक डेनिस वार्ड पिछले करीब नौ साल से नैब में मूक-बधिर बच्चों की देखभाल के लिए नियमित तौर पर आर्थिक मदद देता था और बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाता था।
Author September 6, 2017 05:17 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल)

दिल्ली की एक संस्था नैब यानी नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड के सुरक्षित घेरे में कुछ दृष्टि-बाधित बच्चों के यौन शोषण की घटना से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि बेलगाम कुंठित आपराधिक इच्छाओं से लैस कुछ लोग किस कदर लाचार बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं। गौरतलब है कि ब्रिटेन से भारत आया चौवन वर्षीय ब्रिटिश नागरिक डेनिस वार्ड पिछले करीब नौ साल से नैब में मूक-बधिर बच्चों की देखभाल के लिए नियमित तौर पर आर्थिक मदद देता था और बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाता था। लेकिन इसकी आड़ में उसने आठ साल से कम के तीन बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाया। भरोसे के कत्ल का यह उदाहरण भले नया नहीं हो, लेकिन यह घटना किसी बच्चे की लाचारी का फायदा उठा कर उसका यौन शोषण करने के मामले में एक सभ्य समाज के बीच पलती मानसिक विकृतियों पर सोचने पर मजबूर करती है। लेकिन ज्यादा गंभीर सवाल यह है कि जहां इतने सारे मूक-बधिर और दृष्टि-बाधित बच्चों को रखा गया था, वहां व्यवस्था में इस कदर लापरवाही कैसे बरती गई कि किसी विदेशी व्यक्ति को अपनी आपराधिक कुंठा निकालने का मौका मिला। बल्कि उसके इस अपराध के संगठित होने की भी आशंका है, क्योंकि जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया तब उसके पास से मोबाइल और मैकबुक में काफी संख्या में आपत्तिजनक वीडियो भी मिले। जाहिर है, स्कूल में मौजूद या वहां आने वाले बाहरी लोगों और उनकी गतिविधियों पर निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी।

सवाल है कि जो बच्चे मूक-बधिर या दृष्टि-बाधित होने के नाते पहले से ही ऐसे अपराधों के लिहाज से जोखिम के हालात में होते हैं, उसके मद्देनजर उनका खयाल रखने और उनकी सुरक्षा तय करने के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों बरती गई? गिरफ्तार ब्रिटिश नागरिक के पास से बरामद सामान और उसकी गतिविधियों से इस बात की भी आशंका पैदा होती है कि क्या उसके तार बाल यौन-शोषण के धंधे में लगे किसी बड़े और अंतरराष्ट्रीय गिरोह से भी जुड़े हुए हैं! अगर ऐसा है और उसकी पहुंच नैब जैसे संस्थानों या स्कूलों में है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी मौजूदगी वाली जगहों पर बच्चे किस कदर असुरक्षित हैं। दरअसल, हमारे यहां के परिवेश में सामाजिक सहयोग को जिस नजर से देखा जाता है, उसमें बच्चों के लिए संवेदनशीलता दर्शाने वाले व्यक्ति के प्रति लोग कृतज्ञता के भाव से भर जाते हैं। छिपे हुए चेहरे में अपराध की मानसिकता में जीने वालों को शायद इसी सामाजिक आश्वस्ति और भरोसे का फायदा मिलता है।

जहां तक बाल यौन शोषण का सवाल है तो इस मसले पर आए तमाम अध्ययनों में यही तथ्य उभर कर सामने आए हैं कि बच्चों के लिए परिचित और यहां तक कि कुछ संबंधी भी ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं। इस मसले पर विशेषज्ञों ने जो सलाह या दिशा-निर्देश जारी किए हैं, उनके मुताबिक बच्चों को सबसे ज्यादा उनके आसपास के लोगों से बचाने की ही बात कही गई है। लेकिन आमतौर पर लोग भरोसे में आकर ऐसे सुझावों की अनदेखी कर देते हैं। इसका नतीजा बच्चों को भुगतना पड़ता है, जो कई बार यौन शोषण का शिकार हो जाते हैं। इसका उनके मन-मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है और कई बार उनके बाद के व्यवहार भी इससे प्रभावित होते हैं। पिछले कुछ समय से बाल यौन शोषण के बढ़ते मामलों को देखते हुए जरूरत इस बात की है कि बच्चों को लेकर हर जगह पर सावधानी बरती जाए, चाहे वह घर हो या स्कूल या कोई और जगह!

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